क्रिकेट के मैदान पर जिन्होंने टीएस सिंहदेव को देखा होगा, वे जानते हैं कि उनसे किसी तरह की चूक की गुंजाइश नहीं होती. न खेल में और ना ही राजनीति में.
लेकिन टीएस सिंहदेव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में कैसे चूक गए, यह समझ पाना मुश्किल है.
राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि उन्हें औद्योगिक घरानों का क़रीबी बता कर उनकी दावेदारी को कमज़ोर किया गया. इसके अलावा राजनीति में क्या पक्ष, क्या विपक्ष; सबसे बेहद आत्मीय होने का नुक़सान भी उन्हें उठाना पड़ा है.
सिंहदेव के अलावा पिछले पांच दिनों में मुख्यमंत्री पद के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और सांसद ताम्रध्वज साहू का नाम भी तेज़ी से उभर कर सामने आया. रायपुर से लेकर दिल्ली तक इन सभी नेताओं के नाम पल-पल बदलते घटनाक्रम के साथ 'प्रबल दावेदार' के तौर पर सामने आते रहे.
कभी टीएस सिंहदेव के मुख्यमंत्री बनने की ख़बर सामने आई तो कभी ताम्रध्वज साहू के नाम पर मुहर लगने की बात कही गई. कभी चरणदास महंत के इलाक़े में समर्थकों ने जश्न मना लिया तो कभी भूपेश बघेल के घर पर पटाखेबाजी हुई. लेकिन रविवार को मुख्यमंत्री के लिए भूपेश बघेल के नाम के ऐलान के साथ सारी अटकलों पर विराम लग गया.
टीएस सिंहदेव
ताजा विधानसभा चुनाव में जिस सरगुजा इलाक़े में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी शुरुआती सभाएं की थीं, उन इलाक़ों की सभी 14 सीटों पर अगर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जीत कर आए हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह जन आकांक्षा भी थी कि इस बार उनके इलाक़े के टीएस सिंहदेव ही मुख्यमंत्री बनेंगे.
अंबिकापुर के वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा कहते हैं, "वे उन थोड़े से राजनेताओं में से हैं, जिनके भीतर कहीं गहरे तक संकोच भरा हुआ है. सरल और सौम्य टीएस सिंहदेव के किसी भी निर्णय में आप नहीं पाएंगे कि उनके भीतर कोई अतिरिक्त महत्वाकांक्षा है. और जब बात दोस्ती की हो, रिश्तों की हो, व्यवहार की हो तो फिर दूसरी तमाम चीज़ें पीछे रह जाती हैं. मुख्यमंत्री का पद भी."
विरासत बनाम संघर्ष
छत्तीसगढ़ की सरगुजा रियासत के 66 साल के राजा त्रिभुवनेश्वर शरण सिंहदेव उनसे एक चौंथाई उम्र वाले लोगों के लिए भी या तो 'महाराज जी' हैं या 'टीएस बाबा'. आम तौर पर सादा-सा कुर्ता-पायजामा पहनने वाले टीएस सिंहदेव पांच राज्यों में चुने गए सर्वाधिक पैसे वाले विधायकों में शुमार हैं.
पिछली सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राज्य का खजाना खाली होने जैसे सवालों पर मज़ाक में कहते थे कि अगर ज़रूरत हुई तो नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव जी से क़र्ज़ ले लेंगे.
सरगुजा देश की उन रियासतों में से रही है, जिसका कांग्रेस पार्टी के शुरुआती दौर से ही लगाव बना हुआ था. दस्तावेज़ बताते हैं कि 1930 में त्रिपुरी में जब कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तब सरगुजा रियासत से 50 से अधिक हाथी और रसद भेजे गए थे.
आज़ादी के बाद जब रियासतों का विलय हो गया, उसके बाद भी मध्य भारत की सियासत में छत्तीसगढ़ की सरगुजा रियासत का दबदबा बरकरार रहा. राजाओं-महाराजाओं से अलग इस रियासत के उत्तराधिकारियों ने अपनी अलग जगह बनाई.
टीएस सिंहदेव के पिता मदनेश्वर सरन सिंह देव जहां मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे, वहीं मां देवेंद्र कुमारी सिंह देव विधायक और मंत्री बनीं. परिवार में ऐसे कई लोग रहे, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर आज भी सक्रिय हैं.
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