तीन दिसंबर 2018. नॉर्वे की प्रोफ़ेशनल फ़ुटबॉलर एडा हेगरबर्ग 23 साल की उम्र में फ़ुटबॉल का सबसे प्रतिष्ठित बैलन डिओर पुरस्कार हासिल करने वाली पहली महिला फ़ुटबॉलर बनीं.
मगर पेरिस में हुई अवॉर्ड सेरिमनी में जो हुआ, वो इस हक़ीक़त का उदाहरण है कि हम महिला खिलाड़ियों के प्रति हमारा नज़रिया कैसा रहता है, भले ही वे कुछ भी हासिल कर लें.
इस ऐतिहासिक रात पर जब हेगरबर्ग ने अपना प्रेरक भाषण ख़त्म किया, इस समारोह में मंच का संचालन कर रहे फ्रेंच डीजे मार्टिन सॉलवेज़ ने अपने करियर में 300 गोल दाग़ने वाली इस खिलाड़ी से पूछा कि क्या आप ट्वर्क (एक तरह का भड़काऊ नृत्य) करना जानती हैं?
हेगरबर्ग ने कहा- 'नो', और वह मंच से चली गईं.
यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया और फ़ुटबॉल समुदाय की ओर से सॉलवेज़ को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा.
महिला खिलाड़ियों से कैसे की जाती है बात?
खेल में हिस्सा लेने वाली महिलाएं या फिर खेल में बतौर फ़ैन रुचि रखने वाली महिलाओं की शिकायत रहती है कि अक्सर उन्हें लिंग के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है और उनसे ऐसे भाव में बात की जाती है जैसे वे कुछ जानती ही न हों.
बहुत सारी वेबसाइटों और अख़बारों के स्पोर्ट्स पेज पुरुष खिलाड़ियों, उनकी रणनीति और उनके प्रदर्शन के विश्लेषणों से भरे रहते हैं.
मगर हमें महिला खिलाड़ियों की कवरेज कब और कितनी बार देखने को मिलती है?
ख़ासकर इस तरह से, जब उनके लिए 'सुंदरता' और 'करियर और लाइफ़ के बीच संतुलन' जैसी शब्दावली को इस्तेमाल न किया गया हो.
मुझे लगता है कि भारत के शहरी या उप-नगरीय इलाक़ों के मध्य वर्ग की बहुत सी लड़कियों के लिए खिलाड़ी बनने का सपना आसान नहीं होता है. यहां तक कि खेल का फ़ैन होना भी किसी संघर्ष से कम नहीं है. महिलाओं या यहां तक कि पुरुषों के लिए भी इसकी शुरुआत दो बुनियादी चीज़ों से होती है- पेंशन की पहचान करना और इसे स्वीकार्यता मिलना.
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