पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के लिए सोमवार की सुबह शायद किसी और दिन के जैसी नहीं थी.
उत्तर प्रदेश पुलिस में अपने 20 साल के करियर के दौरान सुबोध कुमार सिंह ने सुबह की अपनी रूटीन को कभी नहीं बदला.
सुबह सवेरे उठने के बाद सबसे पहले अख़बारों पर नज़र दौड़ाने के अलावा परिवार को फ़ोन करना वो कभी नहीं भूलते थे.
उसी तरह नाश्ते में वो कम तेल वाला परांठा खाना भी कभी नहीं भूलते. फ़िटनेस को लेकर हमेशा सजग रहने वाले इस पुलिस अधिकारी ने हाल ही में सेल्फ़ी खींचने का नया शौक़ भी पाल रखा था.
लेकिन सोमवार की सुबह उन्होंने अपने स्टाफ़ से ये कहते हुए नाश्ता नहीं किया कि वो दोपहर में दाल और रोटी खा लेंगे.
लेकिन उन्हें लंच करने का फिर मौक़ा नहीं मिला क्योंकि दोपहर के वक़्त पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह ग़ुस्से से भरी भीड़ को नियंत्रित करने में लगे थे.
बेक़ाबू भीड़ सुबोध और उनके साथी पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाज़ी कर रही थी और गोलियां भी चला रही थी.
ये भीड़ एक पुलिस थाने के पास ही पुलिसकर्मियों को निशाना बना रही थी. तो सबसे बड़ा सवाल है कि आख़िर हुआ क्या और इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की मौत कैसे हुई.
'कंकाल' मिलने से फैला आक्रोश
इस सबकी शुरुआत सोमवार सुबह नौ बजे हुई.
बुलंदशहर ज़िले के महाव गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने खेतों में कम से कम एक दर्जन गायों के कंकाल देखे थे.
एक स्थानीय निवासी धर्मवीर के अनुसार फ़ौरन ही लगभग दो सौ से ज़्यादा हिंदू खेत में जमा हो गए और इस बात को लेकर आपस में विचार विमर्श करने लगे कि आगे क्या करना है.
धर्मवीर का कहना है कि वो भाग्यशाली रहे कि वो ड्यूटी जाने के लिए वहां से फ़ौरन ही निकल गए थे. क्योंकि इस घटना के अगले दिन पूरा गांव वीरान पड़ा हुआ है.
मुसलमान भी गांव छोड़कर भाग गए हैं क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि कथित तौर पर गाय का कंकाल मिलने के बाद उनपर बदले की कार्रवाई हो सकती है. जबकि गांव के हिंदू निवासी पुलिस के डर से गांव छोड़ कर भाग गए हैं.
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