Sunday, December 30, 2018

अमरीका के बाद कौन करेगा आईएस को क़ाबू?

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने बीते दिनों तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ फोन पर बात की और इसी दौरान सीरिया से अमरीकी सेनाओं को वापस बुलाने का फ़ैसला किया.

इसी फ़ोन कॉल के दौरान जब ट्रंप ने अर्दोआन से पूछा कि अगर अमरीका सीरिया से बाहर निकल जाता है तो क्या तुर्की कथित इस्लामिक स्टेट के बचे-खुचे अस्तित्व को ख़त्म कर सकता है. अर्दोआन ने इसके जवाब में हामी भरते हुए कहा कि तुर्की के लिए ऐसा करना संभव है.

तुर्की के राष्ट्रपति के इस जवाब के बाद ट्रंप ने किसी से सलाह लिए बिना जवाब दिया कि अगर तुर्की ऐसा कर सकता है तो अमरीका सीरिया से बाहर निकल रहा है.

इस कॉन्फ्रेंस कॉल में ट्रंप के साथ अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन भी मौजूद थे. मुझे लगता है कि ये जानकारी बोल्टन के दफ़्तर से ही लीक हुई है.

ट्रंप के फ़ैसले से फंसा तुर्की
ट्रंप के इस फ़ैसले ने तुर्की के लिए बड़ी समस्या को जन्म दे दिया है.

तुर्की ये चाहता था कि अमरीका कुर्दिश लड़ाकों के एक संगठन वाईपीजी को दिए अपने हथियार वापस ले ले.

लेकिन अमरीका ने कहा है कि वो इस्लामिक स्टेट के पूरी तरह ख़त्म होने से पहले हथियार वापस नहीं लेगा.

वाईपीजी वो संगठन है जो सीरियाई युद्ध के मैदान में अमरीका की ओर से लड़ते हुए अमरीकी सिपाहियों की जगह अपना खून पसीना बहाता है.

इस क्षेत्र में अमरीका ने सिर्फ पांच हज़ार सैनिकों को तैनात कर रखा है. ये सैनिक खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान और ड्रोन से जुड़े ऑपरेशनों में काम करते हैं और ज़मीन पर वाईपीजी के लड़ाके युद्ध करते हैं.

क्सी वॉर का दौर
सीरियाई युद्धक्षेत्र में हर बड़ा देश अपने स्तर पर किसी न किसी संगठन का समर्थन कर रहा है.

मिसाल के लिए ईरान ने सीरिया और इराक़ में हिजबुल्लाह के लड़ाकों का इस्तेमाल किया.

तुर्की ने सीरियाई सरकार के विपक्षी खेमे का समर्थन किया और रूस बशर अल असद की सरकार का समर्थन करता है.

सीरियाई ज़मीन पर अमरीका के नाम पर वाईपीजी नाम के इसी कुर्दिश लड़ाका संगठन ने काम किया है.

अमरीका ने इस संगठन को काफ़ी मात्रा में हथियार दे रखे हैं जिससे तुर्की परेशान है.

तुर्की को लगता है कि सीरिया से अमरीका के बाहर निकलने के बाद कुर्दिश लड़ाके सीरिया के उत्तर-पूर्वी हिस्से और इराक़ के उत्तर-पश्चिमी हिस्से पर कब्जा करके अपना एक नया मुल्क खड़ा कर लेंगे.

एक नये संघर्ष की शुरुआत?

अमरीका के सैनिकों को वापस बुलाने के फ़ैसले के बाद सीरिया में एक दूसरे के साथ संघर्षरत छद्म संगठनों को संभालना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

Wednesday, December 26, 2018

अबकी बार नहीं होगा 2014 जैसा धुआंधार प्रचार, 4 महीने में कैसे 5,827 सभाएं करेंगे मोदी?

भारतीय जनता पार्टी ने 13 सितंबर 2013 को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अप्रैल-मई 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया. इस घोषणा के 48 घंटे बाद ही पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को लोकसभा चुनावों में झोंक दिया और लोकसभा चुनाव प्रचार की पहली रैली नरेन्द्र मोदी ने 15 सितंबर को हरियाणा के रेवाड़ी में की.

अब 2019 का लोकसभा चुनाव दस्तक दे रहा है, पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म होते ही आम चुनाव का बिगुल बजने को तैयार है. आम चुनावों के लिए प्रधानमंत्री मोदी 4 जनवरी 2019 को असम की बराक घाटी में सिलचर से भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार की शुरुआत कर रहे हैं.

राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट के मुताबिक इस बार भी लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई 2019 तक कराए जाएंगे. लिहाजा अब राजनीतिक दलों के पास जनवरी से मई तक का समय प्रचार के लिए बचा है. ऐसे में क्या आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री मोदी का वैसा प्रचार कार्यक्रम नहीं तैयार कर रही है जैसा उसने 2014 के चुनावों से पहले किया था.

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गौरतलब है कि पूरी दुनिया में 2014 का भारतीय चुनाव एक मिसाल है जब विपक्ष में बैठी पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर नरेन्द्र मोदी को सामने किया और सितंबर 2013 से मई 2014 तक इस उम्मीदवार के लिए पूरे देश में रैलियां, चुनावी कार्यक्रम, थ्री डी रैलियां और चाय पर चर्चा को मिलाकर कुल 5,827 कार्यक्रम आयोजित किए गए.

2014 चुनाव प्रचार के इन कुल 5,827 कार्यक्रमों में नरेन्द्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी और अमरेली से अरुणाचल प्रदेश तक कुल 437 विशाल जनसभाओं को संबोधित किया. इनमें नरेन्द्र मोदी ने देश के 21 राज्यों में 38 विशाल रैलियां कीं. इनमें सर्वाधिक उत्तर प्रदेश में 8 रैलियां की गईं. वहीं कर्नाटक और बिहार में मोदी ने क्रमश: 4 और 3 रैलियां कीं. गौरतलब है कि इस तूफानी चुनाव प्रचार के साथ नरेन्द्र मोदी ने आम चुनावों से पहले देश के 25 राज्यों का दौरा किया.

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2014 के इस तूफानी दौरे की तुलना आगामी चुनावों से करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास अब 4 जनवरी 2019 से लेकर मई 2019 के पहले हफ्ते तक का समय बचा है. इस समय में संसद के सत्र, बजट के विशेष सत्र के अलावा कई ऐसे मौके हैं जब बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रचार के लिए उपलब्धता मुश्किल है. ऐसे में क्या भारतीय जनता पार्टी आगामी चुनावों में प्रचार के लिए प्रधानमंत्री मोदी का इस्तेमाल पूर्व चुनाव की तरह नहीं करने जा रही है?

Sunday, December 16, 2018

छत्तीसगढ़ में सब पर कैसे भारी पड़े भूपेश बघेल

क्रिकेट के मैदान पर जिन्होंने टीएस सिंहदेव को देखा होगा, वे जानते हैं कि उनसे किसी तरह की चूक की गुंजाइश नहीं होती. न खेल में और ना ही राजनीति में.

लेकिन टीएस सिंहदेव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में कैसे चूक गए, यह समझ पाना मुश्किल है.

राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि उन्हें औद्योगिक घरानों का क़रीबी बता कर उनकी दावेदारी को कमज़ोर किया गया. इसके अलावा राजनीति में क्या पक्ष, क्या विपक्ष; सबसे बेहद आत्मीय होने का नुक़सान भी उन्हें उठाना पड़ा है.

सिंहदेव के अलावा पिछले पांच दिनों में मुख्यमंत्री पद के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और सांसद ताम्रध्वज साहू का नाम भी तेज़ी से उभर कर सामने आया. रायपुर से लेकर दिल्ली तक इन सभी नेताओं के नाम पल-पल बदलते घटनाक्रम के साथ 'प्रबल दावेदार' के तौर पर सामने आते रहे.

कभी टीएस सिंहदेव के मुख्यमंत्री बनने की ख़बर सामने आई तो कभी ताम्रध्वज साहू के नाम पर मुहर लगने की बात कही गई. कभी चरणदास महंत के इलाक़े में समर्थकों ने जश्न मना लिया तो कभी भूपेश बघेल के घर पर पटाखेबाजी हुई. लेकिन रविवार को मुख्यमंत्री के लिए भूपेश बघेल के नाम के ऐलान के साथ सारी अटकलों पर विराम लग गया.

टीएस सिंहदेव
ताजा विधानसभा चुनाव में जिस सरगुजा इलाक़े में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी शुरुआती सभाएं की थीं, उन इलाक़ों की सभी 14 सीटों पर अगर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जीत कर आए हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह जन आकांक्षा भी थी कि इस बार उनके इलाक़े के टीएस सिंहदेव ही मुख्यमंत्री बनेंगे.

अंबिकापुर के वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा कहते हैं, "वे उन थोड़े से राजनेताओं में से हैं, जिनके भीतर कहीं गहरे तक संकोच भरा हुआ है. सरल और सौम्य टीएस सिंहदेव के किसी भी निर्णय में आप नहीं पाएंगे कि उनके भीतर कोई अतिरिक्त महत्वाकांक्षा है. और जब बात दोस्ती की हो, रिश्तों की हो, व्यवहार की हो तो फिर दूसरी तमाम चीज़ें पीछे रह जाती हैं. मुख्यमंत्री का पद भी."

विरासत बनाम संघर्ष
छत्तीसगढ़ की सरगुजा रियासत के 66 साल के राजा त्रिभुवनेश्वर शरण सिंहदेव उनसे एक चौंथाई उम्र वाले लोगों के लिए भी या तो 'महाराज जी' हैं या 'टीएस बाबा'. आम तौर पर सादा-सा कुर्ता-पायजामा पहनने वाले टीएस सिंहदेव पांच राज्यों में चुने गए सर्वाधिक पैसे वाले विधायकों में शुमार हैं.

पिछली सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राज्य का खजाना खाली होने जैसे सवालों पर मज़ाक में कहते थे कि अगर ज़रूरत हुई तो नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव जी से क़र्ज़ ले लेंगे.

सरगुजा देश की उन रियासतों में से रही है, जिसका कांग्रेस पार्टी के शुरुआती दौर से ही लगाव बना हुआ था. दस्तावेज़ बताते हैं कि 1930 में त्रिपुरी में जब कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तब सरगुजा रियासत से 50 से अधिक हाथी और रसद भेजे गए थे.

आज़ादी के बाद जब रियासतों का विलय हो गया, उसके बाद भी मध्य भारत की सियासत में छत्तीसगढ़ की सरगुजा रियासत का दबदबा बरकरार रहा. राजाओं-महाराजाओं से अलग इस रियासत के उत्तराधिकारियों ने अपनी अलग जगह बनाई.

टीएस सिंहदेव के पिता मदनेश्वर सरन सिंह देव जहां मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे, वहीं मां देवेंद्र कुमारी सिंह देव विधायक और मंत्री बनीं. परिवार में ऐसे कई लोग रहे, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर आज भी सक्रिय हैं.

Thursday, December 13, 2018

महिला खिलाड़ियों की क़ाबिलियत हज़म नहीं होती- ब्लॉग

तीन दिसंबर 2018. नॉर्वे की प्रोफ़ेशनल फ़ुटबॉलर एडा हेगरबर्ग 23 साल की उम्र में फ़ुटबॉल का सबसे प्रतिष्ठित बैलन डिओर पुरस्कार हासिल करने वाली पहली महिला फ़ुटबॉलर बनीं.

मगर पेरिस में हुई अवॉर्ड सेरिमनी में जो हुआ, वो इस हक़ीक़त का उदाहरण है कि हम महिला खिलाड़ियों के प्रति हमारा नज़रिया कैसा रहता है, भले ही वे कुछ भी हासिल कर लें.

इस ऐतिहासिक रात पर जब हेगरबर्ग ने अपना प्रेरक भाषण ख़त्म किया, इस समारोह में मंच का संचालन कर रहे फ्रेंच डीजे मार्टिन सॉलवेज़ ने अपने करियर में 300 गोल दाग़ने वाली इस खिलाड़ी से पूछा कि क्या आप ट्वर्क (एक तरह का भड़काऊ नृत्य) करना जानती हैं?

हेगरबर्ग ने कहा- 'नो', और वह मंच से चली गईं.

यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया और फ़ुटबॉल समुदाय की ओर से सॉलवेज़ को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा.

महिला खिलाड़ियों से कैसे की जाती है बात?
खेल में हिस्सा लेने वाली महिलाएं या फिर खेल में बतौर फ़ैन रुचि रखने वाली महिलाओं की शिकायत रहती है कि अक्सर उन्हें लिंग के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है और उनसे ऐसे भाव में बात की जाती है जैसे वे कुछ जानती ही न हों.

बहुत सारी वेबसाइटों और अख़बारों के स्पोर्ट्स पेज पुरुष खिलाड़ियों, उनकी रणनीति और उनके प्रदर्शन के विश्लेषणों से भरे रहते हैं.

मगर हमें महिला खिलाड़ियों की कवरेज कब और कितनी बार देखने को मिलती है?

ख़ासकर इस तरह से, जब उनके लिए 'सुंदरता' और 'करियर और लाइफ़ के बीच संतुलन' जैसी शब्दावली को इस्तेमाल न किया गया हो.

मुझे लगता है कि भारत के शहरी या उप-नगरीय इलाक़ों के मध्य वर्ग की बहुत सी लड़कियों के लिए खिलाड़ी बनने का सपना आसान नहीं होता है. यहां तक कि खेल का फ़ैन होना भी किसी संघर्ष से कम नहीं है. महिलाओं या यहां तक कि पुरुषों के लिए भी इसकी शुरुआत दो बुनियादी चीज़ों से होती है- पेंशन की पहचान करना और इसे स्वीकार्यता मिलना.

Monday, December 10, 2018

आखिर परेशान होकर शाहिद ने कर ही दिया ट्वीट

इरफान खान, सोनाली बेंद्रे और ऋषि कपूर जैसे सितारे फिलहाल अपनी बीमारी का इलाज करा रहे हैं. दोनों की बीमारी पिछले कई दिनों से सुर्ख़ियों में है. हाल ही में बॉलीवुड एक्टर शाहिद कपूर को लेकर भी एक ऐसी अफवाह उड़ी कि एक्टर को सामने आकर अपना पक्ष रखना पड़ा.

दरअसल, कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि शाहिद को कैंसर है. इस खबर ने प्रशंसकों समेत मनोरंजन जगत में हलचल मचा दी. अफवाहों से तंग आकर एक्टर ने एक ट्वीट किया. उन्होंने लिखा, "मैं पूरी तरह से फिट हूं, किसी भी तरह की अफवाह पर ध्यान नही दें."

बता दें कि मनोरंजन की कई वेबसाइट्स ने शाहिद का नाम न लेते हुए खबर चलाई थी कि एक्टर पेट के कैंसर से पीड़ित हैं. यह भी कहा गया कि कैंसर फर्स्‍ट स्‍टेज में है और एक्टर इसका इलाज भी करा रहे ह‍ैं.

जब इस बारे में शाहिद के परिवार से पूछा गया तो उन्होंने तीखी प्रत‍िक्र‍िया दी. इन सारी खबरों को अफवाह बताते हुए शाह‍िद के पर‍िवार ने कहा, "लोग कुछ भी कैसे लिख सकते हैं? आखिर इस खबर का आधार क्‍या है? इस तरह की अफवाह फैलाने को आखिर कैसे जायज ठहराया जा सकता है?"

शाह‍िद कपूर इन दिनों अपनी नई फिल्‍म "कबीर सिंह" की शूटिंग में व्यस्त हैं. यह फिल्म 21 जून 2019 में र‍िलीज होगी. इसके पहले शाह‍िद की श्रद्धा कपूर संग "बत्ती गुल मीटर चालू" फ‍िल्म र‍िलीज हुई थी. हालांकि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाल नहीं कर सकी. इस साल शाहिद के खाते में सिर्फ एक सफल फिल्म दर्ज है. ये फिल्म थी संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी "पद्मावत".  फिल्म में शाहिद, दीपिका के अपोजिट थे.

सारा का काम देखकर उनकी दादी, शर्म‍िला टैगोर भी काफी संतुष्ट हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मुझे सरप्राइज होता है ये देखकर कि वो इतनी छोटी उम्र में इतनी मेच्योर है. उसके इंटरव्यू सुने हैं. वो बहुत अच्छा काम कर रही है."

बताते चलें कि केदारनाथ बॉक्स ऑफिस पर संतोषजनक कारोबार कर रही है. फिल्म ने दो द‍िन में 17 करोड़ की कमाई कर ली है. इसी महीने 28 दिसंबर को सारा की दूसरी फिल्म, "सिंबा" र‍िलीज हो रही है. रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सारा के अपोजिट रणवीर सिंह हैं. फिल्म के कुछ गाने र‍िलीज हुए हैं. सारा और रणवीर की जोड़ी को पसंद किया जा रहा है. 

Tuesday, December 4, 2018

बुलंदशहर में कैसे हुई पुलिस अफ़सर सुबोध कुमार सिंह की हत्या

पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के लिए सोमवार की सुबह शायद किसी और दिन के जैसी नहीं थी.

उत्तर प्रदेश पुलिस में अपने 20 साल के करियर के दौरान सुबोध कुमार सिंह ने सुबह की अपनी रूटीन को कभी नहीं बदला.

सुबह सवेरे उठने के बाद सबसे पहले अख़बारों पर नज़र दौड़ाने के अलावा परिवार को फ़ोन करना वो कभी नहीं भूलते थे.

उसी तरह नाश्ते में वो कम तेल वाला परांठा खाना भी कभी नहीं भूलते. फ़िटनेस को लेकर हमेशा सजग रहने वाले इस पुलिस अधिकारी ने हाल ही में सेल्फ़ी खींचने का नया शौक़ भी पाल रखा था.

लेकिन सोमवार की सुबह उन्होंने अपने स्टाफ़ से ये कहते हुए नाश्ता नहीं किया कि वो दोपहर में दाल और रोटी खा लेंगे.

लेकिन उन्हें लंच करने का फिर मौक़ा नहीं मिला क्योंकि दोपहर के वक़्त पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह ग़ुस्से से भरी भीड़ को नियंत्रित करने में लगे थे.

बेक़ाबू भीड़ सुबोध और उनके साथी पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाज़ी कर रही थी और गोलियां भी चला रही थी.

ये भीड़ एक पुलिस थाने के पास ही पुलिसकर्मियों को निशाना बना रही थी. तो सबसे बड़ा सवाल है कि आख़िर हुआ क्या और इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की मौत कैसे हुई.

'कंकाल' मिलने से फैला आक्रोश

इस सबकी शुरुआत सोमवार सुबह नौ बजे हुई.

बुलंदशहर ज़िले के महाव गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने खेतों में कम से कम एक दर्जन गायों के कंकाल देखे थे.

एक स्थानीय निवासी धर्मवीर के अनुसार फ़ौरन ही लगभग दो सौ से ज़्यादा हिंदू खेत में जमा हो गए और इस बात को लेकर आपस में विचार विमर्श करने लगे कि आगे क्या करना है.

धर्मवीर का कहना है कि वो भाग्यशाली रहे कि वो ड्यूटी जाने के लिए वहां से फ़ौरन ही निकल गए थे. क्योंकि इस घटना के अगले दिन पूरा गांव वीरान पड़ा हुआ है.

मुसलमान भी गांव छोड़कर भाग गए हैं क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि कथित तौर पर गाय का कंकाल मिलने के बाद उनपर बदले की कार्रवाई हो सकती है. जबकि गांव के हिंदू निवासी पुलिस के डर से गांव छोड़ कर भाग गए हैं.