बिहार में बीबीसी हिन्दी सेवा के बोले बिहार कार्यक्रम की शुरुआत बीबीसी हिन्दी के संपादक मुकेश शर्मा के संबोधन के साथ हुई. मुकेश शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि बिहार राजनीतिक रूप से जागरूक तो है लेकिन लंबे समय से पिछड़ेपन का दंश झेल रहा है.
कार्यकम के पहले वक़्ता बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय चौधरी ने कहा कि बीबीसी और बिहार का ख़ास संबंध रहा है. चौधरी ने कहा कि बीबीसी ने बिहारवासियों को जागरूक बनाने में अहम भूमिका अदा की है. विजय चौधरी ने बीबीसी रेडियो के प्रसारण में तकनीकी ख़ामियों को भी उठाया.
विजय चौधरी ने ख़ुद को ग़ैर-राजनीतिक राजनेता बताया. चौधरी ने चुनाव को लेकर कहा कि ईवीएम में नोटा का विकल्प नहीं होना चाहिए. चौधरी ने कहा कि यह इलेक्शन है न कि रिजेक्शन है.
कार्यक्रम के पहले सत्र की शुरुआत में लोकसभा चुनाव में बिहार की क्या भूमिका होगी पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अखिलेश सिंह और जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने अपनी बातें रखीं.
शिवानंद तिवारी ने कहा कि 2014 के आम चुनाव में भी बिहार की अहम भूमिका थी और इस बार भी अहम भूमिका होगी. शिवानंद तिवारी ने केंद्र के मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "सरकार आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाती. ऐसा लगता है कि सरकार का विश्वास लोकतंत्र और संविधान में नहीं है. सरकार एक तबके को टार्गेट कर रही है, पाकिस्तान भेज रही है. इससे समाज में तनाव पैदा हो रहा है. इस सरकार को हटाया जाना चाहिए."
कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह ने कहा कि बिहार बदहाली के दौर से गुजर रहा है और यह हर क्षेत्र में है. सिंह ने कहा कि पटना यूनिवर्सिटी का स्वर्णिम इतिहास रहा था लेकिन वर्तमान की हालत बयां करना भी मुश्किल है. सिंह ने कहा कि बिहार के साथ अन्याय हो रहा है.
उन्होंने कहा, "बिहार के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है. केंद्र सरकार उसका हिस्सा नहीं दे रही है. मुख्यमंत्री गिड़गिड़ाते रहे लेकिन पीएम ने सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देने की बात अनसुनी कर दी. बंद पड़ी चीनी मिलें नहीं खुल रही हैं."
जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा कि बिहार को नीतीश कुमार ने दिशा दिखाई है. आलोक ने कहा कि महागठबंधन की अवधारणा नीतीश कुमार ने दी लेकिन वो भ्रष्टाचार के साथ नहीं रह सकते थे.
शिवानंद तिवारी और अखिलेश सिंह से असहमति जताते हुए अजय आलोक ने कहा कि बिहार में किसान आत्महत्या नहीं करते हैं क्योंकि उनकी स्थिति अच्छी है.
इस परिचर्चा में बेरोज़गारी की समस्या को लेकर तीनों दलों के नेताओं के बीच अहम मुद्दा रहा. शिवानंद तिवारी ने कहा बेरोज़गारी और खेती-किसानी की समस्या विकराल हो गई है और यह कभी भी विस्फोट कर सकता है.
परिचर्चा को संचालित करते हुए मुकेश शर्मा ने पूछा कि जब कांग्रेस के नेता बुनियादी मुद्दों को उठाते हैं तो लोग पलटकर पूछते हैं कि कांग्रेस दशकों तक केंद्र और राज्यों की सत्ता में रही तब भी ये मुद्दे क्यों नहीं सुलझ पाए?
इस सवाल के जवाब में अखिलेश सिंह ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया.
पलायन का सवाल
इन नेताओं से आम लोगों ने भी सवाल पूछे. एक शोध छात्र ने अजय आलोक से पूछा कि बिहार से पलायन इतना ज़्यादा है तो इस पर कोई ठोस नीति क्यों नहीं बन रही है. इस सवाल के जवाब में अजय आलोक ने कहा कि आबादी ज़्यादा है और देश में कोई भी कहीं भी जा सकता है.
बिहार से प्रतिभा के पलायन की बात को अजय आलोक ने ख़ारिज कर दिया. दूसरी तरफ़ अखिलेश सिंह आरजेडी और कांग्रेस के गठबंधन में सीटों के बँटवारे के सवाल को टाल गए.
शिवानंद तिवारी ने कहा कि मोदी सरकार रोज़गार के सवाल पर नाकाम रही है इसलिए सवर्णों को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ा है. अजय आलोक से एक लड़की ने पूछा कि आप ट्रक चलाने वालों को रोज़गार से जोड़ रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी उनके घर जाकर देखा कि वो उस रोज़गार से कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं? इस सवाल पर लोगों ने ख़ूब तालियां मारीं.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में 'क्षेत्रीय पार्टियों का मोर्चा विकल्प क्यों नहीं बन पाता' इस विषय पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में सीपीआई (एमएल) की मीना तिवारी और बीजेपी नेता अमृता भूषण शामिल हुईं. परिचर्चा का संचालन बीबीसी हिन्दी के रेडियो संपादक राजेश जोशी ने किया.
मीना तिवारी जब अपनी बात कह रही थीं तो उनकी बातों में वामपंथी पार्टियों की ओर से इस्तेमाल होने वाले टर्म फासीवाद का इस्तेमाल किया तो राजेश जोशी ने लोगों से पूछा कि वो क्या इस टर्म को समझते हैं तो दो तीन को छोड़कर किसी ने नहीं कहा कि वो इसे समझते हैं.
इस परिचर्चा में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी ज़ोर-शोर से उठा. मुज़फ़्फ़रपुर में एक बालिका गृह की बच्चियों के यौन उत्पीड़न का भी मुद्दा उठा. बीजेपी की अमृता भूषण ने अपनी सरकार की तारीफ़ की तो मीना तिवारी ने सरकार को नाकाम बताया. दोनों नेता दावा कर रहे थे तो राजेश जोशी ने लोगों से पूछा कि क्या उन्हें इन दावों पर भरोसा है? इस सवाल के जवाब में लगभग लोगों ने जवाब में उन नेताओं के सामने ना कहा.
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