खेल डेस्क. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में शुक्रवार को राजस्थान रॉयल्स का मुकाबला सनराइजर्स हैदराबाद से होगा। दोनों टीमों में अब तक नौ मुकाबले खेले गए हैं, जिसमें हैदराबाद 5 को जीतने में सफल रहा है। राजस्थान की टीम सिर्फ 4 मुकाबले ही अपने नाम कर पाई है। हैदराबाद का सक्सेस रेट 55.55% रहा। हैदराबाद के राजीव गांधी स्टेडियम में दोनों के बीच दो मैच खेले गए हैं। दोनों में मेजबान हैदराबाद को ही सफलता मिली।
दोनों टीमें अपने-अपने पहले मैच हार गईं थीं
टूर्नामेंट के इस सीजन में दोनों टीमें अपना दूसरा मैच खेलेंगी।दोनों ही टीमें अपने पहले मैच हार चुकी हैं। राजस्थान को किंग्स इलेवन पंजाब ने 14 रन से हराया था। हैदराबाद को कोलकाता के हाथों 6 विकेट से हार झेलनी पड़ी थी।
राजीव गांधी स्टेडियम में सनराइजर्स का हाइएस्ट स्कोर 209 रन है। यह स्कोर उसने 2017 में कोलकाता के खिलाफ बनाया था। वहीं, राजस्थान का हाइएस्ट स्कोर 125 रन है। यह उसने पिछले सीजन में बनाए थे। सनराइजर्स की टीम ने इस मैदान पर तीन बार 200 से ज्यादा का स्कोर कर चुकी है।
राजस्थान की टीम अपने पहले मैच में पंजाब के खिलाफ जीत के करीब पहुंच कर हार गई थी। उस मैच में पंजाब के कप्तान रविचंद्रन अश्विन ने जोस बटलर को 'मांकड़िंग' रन आउट कर दिया था। इसके बाद वे गुस्से में मैदान से बाहर निकले थे। टीम इस विवाद से भी बाहर निकलना चाहेगी।
बटलर ने 69 रन बनाए थे। कप्तान अजिंक्य रहाणे ने 27, संजू सैमसन ने 30 और स्टीव स्मिथ ने 20 रन की पारी खेली थी। राजस्थान टीम प्रबंधन चाहेगी कि बटलर के साथ-साथ ये तीनों खिलाड़ी भी लंबी पारियां खेले। साथ ही टीम बेन स्टोक्स से बल्ले और गेंद दोनों से योगदान चाहेगी।
दूसरी ओर, सनराइजर्स को डेविड वॉर्नर और जॉनी बेयर्स्टो से दोबारा बेहतर शुरुआत की उम्मीद होगी। कोलकाता के खिलाफ दोनों ने पहले विकेट के लिए शतकीय साझेदारी की थी। वॉर्नर ने 85 रन बनाए थे। इस मुकाबले में उनके साथ-साथ विजय शंकर पर भी नजर रहेगी। उन्होंने पहले मुकाबले में 24 गेंद पर 40 रन बनाए थे।
दोनों टीमें
राजस्थान रॉयल्स : अंजिक्य रहाणे (कप्तान), जोस बटलर (विकेटकीपर), स्टीव स्मिथ, संजू सैमसन, बेन स्टोक्स, कृष्णप्पा गौतम, जोफ्रा आर्चर, श्रेयस गोपाल, जयदेव उनादकट, धवल कुलकर्णी, वरुण अरोन, मनन वोहरा, आर्यमन बिड़ला, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, रियान पराग, स्टुअर्ट बिन्नी, शुभमन रंजाने, महिपाल लोमरोर, प्रशांत चोपड़ा, ईश सोढ़ी, ओशाने थॉमस, सुधीसन मिथुन।
सनराइजर्स हैदराबाद : , भुवनेश्वर कुमार (कप्तान), मनीष पांडेय, मार्टिन गुप्टिल, रिकी भुई, डेविड वॉर्नर, दीपक हुड्डा, मोहम्मद नबी, यूसुफ पठान, शाकिब अल हसन, अभिषेक शर्मा, विजय शंकर, श्रीवत्स गोस्वामी, जॉनी बेयर्स्टो, ऋद्धिमान साहा, सिद्धार्थ कौल, खलील अहमद, राशिद खान, बासिल थम्पी, बिली स्टैनलेक, टी नटराजन, संदीप शर्मा, शाहबाज नदीम।
अयोध्या. कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का रोड शो शुरू हो गया। वे फैजाबाद के कुमारगंज से अयोध्या के हनुमानगढ़ी तक 47 किलोमीटर का रोड शो कर रही हैं। इस दौरान प्रियंका ने जनसभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार पर निशाना साधा। प्रियंका ने कहा, मोदी, अमेरिका-चीन समेत पूरी दुनिया में हर जगह घूम आए, लेकिन उन्हें अपने लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में जाने का वक्त नहीं मिला।
भाजपा के गढ़ में साढ़े पांच घंटे रहेंगी प्रियंका
अयोध्या, भाजपा की सत्ता का केंद्र है। ऐसे में वे यहां करीब साढ़े पांच घंटे रहेंगी। रोड शो की कमान कांग्रेस प्रत्याशी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री संभाल रहे हैं। प्रियंका रामलला तो नहीं जाएंगी। कुछ संतों ने प्रियंका के अयोध्या दौरे पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि प्रियंका हनुमानगढ़ी आएं तो उन्हें ऐलान करना चाहिए कि उनकी सरकार बनने पर राम मंदिर बनेगा।
गंगा यात्रा के बाद अब रामनगरी में प्रियंका
प्रियंका ने 18 मार्च को प्रयागराज के मनैया घाट से गंगा यात्रा की शुरूआत की थी। इस दौरान उन्होंने सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए भाजपा को घेरा। उन्होंने संगम पर बड़े हनुमान की पूजा-अर्चना की तो अक्षयवट के दर्शन किए थे। प्रियंका ने बोट यात्रा कर मंदिर से लेकर मजार पर गई थी। गांधी-नेहरू परिवार से 2016 में राहुल ने अयोध्या का दौरा किया था और अब प्रियंका पहुंचीं हैं।
Friday, March 29, 2019
Monday, March 25, 2019
ये कांग्रेस युक्त भारत का समय है: शत्रुघ्न सिन्हा
भारतीय जनता पार्टी के टिकट से दो बार सांसद रह चुके शत्रुघ्न सिन्हा ने रविवार को ट्वीट करके कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के संकेत दिए हैं.
बीजेपी ने साल 2019 के चुनाव में सिन्हा की जगह रविशंकर प्रसाद को टिकट देने का फ़ैसला किया है. इसके बाद से शत्रुघ्न सिन्हा और बीजेपी नेताओं के बीच ट्विटर पर तीखी नोकझोंक देखी जा रही है.
शत्रुघ्न सिन्हा ने पहले लालकृष्ण आडवाणी के टिकट काटे जाने पर विरोध दर्ज कराया था. स इसके बाद अब उन्होंने कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के संकेत दिए हैं.
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने ट्वीट में कहा है, "सरजी, मुझे लगता है कि आप कांग्रेस में समाए वंशवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को लेकर काफ़ी बैचेन हैं. लेकिन आप में इतनी बैचेनी क्यों हैं? आपको सिर्फ़ अपने आसपास देखने की ज़रूरत है और अपनी सहयोगी पार्टियों में देखने की ज़रूरत है. हर पार्टी इस कथित वंशवाद से भरी हुई है."
"आपकी पार्टी में भी मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र में और आपके सहयोगियों में भी ये चीज़ देखी जा सकती है. इसके साथ ही आपने जो कांग्रेस मुक्त भारत का वादा किया था उसका क्या हुआ? क्या ये भी स्मार्ट सिटी जैसे दूसरे वादों की तरह हवा में उड़ गया. आप चिंता न करें. क्योंकि ये कांग्रेस युक्त भारत के लिए सबसे उचित समय है. जय हिंद."
वहीं, भारतीय जनता पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी ने रविवार को ट्विटर पर बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा को कांग्रेस के टिकट पर पटना से चुनाव नहीं लड़ने की सलाह दी है.
बॉलीवुड में अपनी एक्टिंग से धाक जमाने के बाद राजनीति में क़दम रखने वाले शत्रुघ्न सिन्हा बीते दो लोकसभा चुनावों से पटना साहिब से चुनाव जीतते आ रहे हैं.
शत्रुघ्न सिन्हा ने साल 2009 में 57 फ़ीसदी वोट और 2014 में 55 फ़ीसदी वोटों के साथ इस सीट पर भाजपा को जीत दिलाई थी.
लेकिन सिन्हा का टिकट रविशंकर प्रसाद को दिए जाने के बाद ख़बरें आ रही हैं कि शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब से चुनाव लड़ने जा रहे हैं.
सुशील कुमार मोदी ने ऐसी ही ख़बरों के आधार पर शत्रुघ्न सिन्हा को टैग करते हुए ट्वीट किया है कि वह पटना साहिब से चुनाव लड़ने के बारे में न सोचें क्योंकि उन्हें पटना में पोलिंग एजेंट मिलने भी मुश्किल हो जाएंगे.
आडवाणी के टिकट पर नाराज़ थे शत्रुघ्न
शत्रुघ्न सिन्हा ने इससे पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के टिकट काटे जाने पर अपनी नाराजगी ट्विटर पर ज़ाहिर की थी.
उन्होंने कहा था, "आडवाणी जी की जगह पार्टी अध्यक्ष को दिया जाना, किसी भी तरह से ठीक नहीं है. उनकी शख्सियत और छवि आडवाणी के बराबर नहीं है. ये क़दम जानबूझकर और एक मक़सद के साथ उठाया गया है. और देश की जनता को ये फ़ैसला पसंद नहीं आया है. वह एक पितृपुरुष जैसे हैं. और एक पितृपुरुष के साथ इस तरह के सलूक को कोई स्वीकार नहीं करेगा. मैं आपके लोगों को इसी भाषा में जवाब देने में सक्षम हूं."
"न्यूटन का तीसरा नियम याद रखना चाहिए जो बताता है कि हर क्रिया की बराबर और उलटी प्रतिक्रिया होती है. मैं आपको जवाब देने में सक्षम हूं. लेकिन आपने जो आदरणीय यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, मुरली मनोहर जोशी और आडवाणी जी के साथ किया है, वो आपकी कृतघ्नता को दिखाता है."
भाजपा नेता स्मृति ईरानी और कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला दोनों के बीच सोशल मीडिया पर बड़ी बहस चल रही है.
जहां स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दो जगहों से लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना को लेकर ताना दिया है वहीं इसका उत्तर देने के लिए सुरजेवाला सामने आए हैं.
स्मृति ईरानी ने शनिवार को ट्वीट किया था "अमेठी ने भगाया, जगह-जगह से बुलावे का स्वांग रचाया, क्योंकि जनता ने ठुकराया."
उन्होंने पत्रकार पंकज झा का एक वीट भी शेयर किया जिसमें ज़िला प्रदेश कमिटी अमेठी की एक चिट्ठी ट्वीट की गई थी. इस चिट्ठी के अनुसार कमिटी ने राहुल गांधी से गुज़रिश की है कि वो दक्षिण भारत केकार्यकर्ताओं का निमंत्रण स्वीकार करें और वहां की एक जगह से भी चुनाव लड़ें.
पंकज झा का सवाल है कि "क्या ऐसी भूमिका तो नहीं बनाई जा रही है कि राहुल गॉंधी के दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ें."
स्मृति ईरानी के ट्वीट के उत्तर में सुरजेवाले ने सोशल मीडिया पर कहा है, "चाँदनी चौक ने हराया, अमेठी ने हरा कर भगाया, जिसे बार बार जनता ने ठुकराया, हर बार राज्य सभा से संसद का रास्ता पाया. अब अमेठी ने हार की हैट्रिक का मौहाल बनाया."
दो दिन पहले भाजपा ने चुनावों के मद्देनज़र 184 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी जिसमें अमेठी से स्मृति ईरानी का नाम चुना गया था.
ग़ौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह इस बार भी अमेठी से भाजपा के टिकट पर स्मृति ईरानी चुनाव लड़ रही हैं. वहीं कांग्रेस पर्टी से यहां राहुल गांधी खड़े हो रहे हैं. 2014 के चुनावों में स्मृति ईरानी 1.07 वोटों से पीछे रह गई थीं.
शनिवार को केरल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष उमेन चांडी ने राहुल गांधी से गुज़ारिश की कि वो वायनाड चुनाव क्षेत्र से मैदान में उतरें. उनका कहना था कि प्रदेश से जो उम्मीदवार चुने गए हैं उनसे बात करने के बाद ही ये गुज़ारिश की जा रही है.
बीजेपी ने साल 2019 के चुनाव में सिन्हा की जगह रविशंकर प्रसाद को टिकट देने का फ़ैसला किया है. इसके बाद से शत्रुघ्न सिन्हा और बीजेपी नेताओं के बीच ट्विटर पर तीखी नोकझोंक देखी जा रही है.
शत्रुघ्न सिन्हा ने पहले लालकृष्ण आडवाणी के टिकट काटे जाने पर विरोध दर्ज कराया था. स इसके बाद अब उन्होंने कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के संकेत दिए हैं.
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने ट्वीट में कहा है, "सरजी, मुझे लगता है कि आप कांग्रेस में समाए वंशवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को लेकर काफ़ी बैचेन हैं. लेकिन आप में इतनी बैचेनी क्यों हैं? आपको सिर्फ़ अपने आसपास देखने की ज़रूरत है और अपनी सहयोगी पार्टियों में देखने की ज़रूरत है. हर पार्टी इस कथित वंशवाद से भरी हुई है."
"आपकी पार्टी में भी मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र में और आपके सहयोगियों में भी ये चीज़ देखी जा सकती है. इसके साथ ही आपने जो कांग्रेस मुक्त भारत का वादा किया था उसका क्या हुआ? क्या ये भी स्मार्ट सिटी जैसे दूसरे वादों की तरह हवा में उड़ गया. आप चिंता न करें. क्योंकि ये कांग्रेस युक्त भारत के लिए सबसे उचित समय है. जय हिंद."
वहीं, भारतीय जनता पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी ने रविवार को ट्विटर पर बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा को कांग्रेस के टिकट पर पटना से चुनाव नहीं लड़ने की सलाह दी है.
बॉलीवुड में अपनी एक्टिंग से धाक जमाने के बाद राजनीति में क़दम रखने वाले शत्रुघ्न सिन्हा बीते दो लोकसभा चुनावों से पटना साहिब से चुनाव जीतते आ रहे हैं.
शत्रुघ्न सिन्हा ने साल 2009 में 57 फ़ीसदी वोट और 2014 में 55 फ़ीसदी वोटों के साथ इस सीट पर भाजपा को जीत दिलाई थी.
लेकिन सिन्हा का टिकट रविशंकर प्रसाद को दिए जाने के बाद ख़बरें आ रही हैं कि शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब से चुनाव लड़ने जा रहे हैं.
सुशील कुमार मोदी ने ऐसी ही ख़बरों के आधार पर शत्रुघ्न सिन्हा को टैग करते हुए ट्वीट किया है कि वह पटना साहिब से चुनाव लड़ने के बारे में न सोचें क्योंकि उन्हें पटना में पोलिंग एजेंट मिलने भी मुश्किल हो जाएंगे.
आडवाणी के टिकट पर नाराज़ थे शत्रुघ्न
शत्रुघ्न सिन्हा ने इससे पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के टिकट काटे जाने पर अपनी नाराजगी ट्विटर पर ज़ाहिर की थी.
उन्होंने कहा था, "आडवाणी जी की जगह पार्टी अध्यक्ष को दिया जाना, किसी भी तरह से ठीक नहीं है. उनकी शख्सियत और छवि आडवाणी के बराबर नहीं है. ये क़दम जानबूझकर और एक मक़सद के साथ उठाया गया है. और देश की जनता को ये फ़ैसला पसंद नहीं आया है. वह एक पितृपुरुष जैसे हैं. और एक पितृपुरुष के साथ इस तरह के सलूक को कोई स्वीकार नहीं करेगा. मैं आपके लोगों को इसी भाषा में जवाब देने में सक्षम हूं."
"न्यूटन का तीसरा नियम याद रखना चाहिए जो बताता है कि हर क्रिया की बराबर और उलटी प्रतिक्रिया होती है. मैं आपको जवाब देने में सक्षम हूं. लेकिन आपने जो आदरणीय यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, मुरली मनोहर जोशी और आडवाणी जी के साथ किया है, वो आपकी कृतघ्नता को दिखाता है."
भाजपा नेता स्मृति ईरानी और कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला दोनों के बीच सोशल मीडिया पर बड़ी बहस चल रही है.
जहां स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दो जगहों से लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना को लेकर ताना दिया है वहीं इसका उत्तर देने के लिए सुरजेवाला सामने आए हैं.
स्मृति ईरानी ने शनिवार को ट्वीट किया था "अमेठी ने भगाया, जगह-जगह से बुलावे का स्वांग रचाया, क्योंकि जनता ने ठुकराया."
उन्होंने पत्रकार पंकज झा का एक वीट भी शेयर किया जिसमें ज़िला प्रदेश कमिटी अमेठी की एक चिट्ठी ट्वीट की गई थी. इस चिट्ठी के अनुसार कमिटी ने राहुल गांधी से गुज़रिश की है कि वो दक्षिण भारत केकार्यकर्ताओं का निमंत्रण स्वीकार करें और वहां की एक जगह से भी चुनाव लड़ें.
पंकज झा का सवाल है कि "क्या ऐसी भूमिका तो नहीं बनाई जा रही है कि राहुल गॉंधी के दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ें."
स्मृति ईरानी के ट्वीट के उत्तर में सुरजेवाले ने सोशल मीडिया पर कहा है, "चाँदनी चौक ने हराया, अमेठी ने हरा कर भगाया, जिसे बार बार जनता ने ठुकराया, हर बार राज्य सभा से संसद का रास्ता पाया. अब अमेठी ने हार की हैट्रिक का मौहाल बनाया."
दो दिन पहले भाजपा ने चुनावों के मद्देनज़र 184 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी जिसमें अमेठी से स्मृति ईरानी का नाम चुना गया था.
ग़ौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह इस बार भी अमेठी से भाजपा के टिकट पर स्मृति ईरानी चुनाव लड़ रही हैं. वहीं कांग्रेस पर्टी से यहां राहुल गांधी खड़े हो रहे हैं. 2014 के चुनावों में स्मृति ईरानी 1.07 वोटों से पीछे रह गई थीं.
शनिवार को केरल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष उमेन चांडी ने राहुल गांधी से गुज़ारिश की कि वो वायनाड चुनाव क्षेत्र से मैदान में उतरें. उनका कहना था कि प्रदेश से जो उम्मीदवार चुने गए हैं उनसे बात करने के बाद ही ये गुज़ारिश की जा रही है.
Monday, March 18, 2019
Unerwarteter Ärger mit dem Eigenheim
Krach um 600 000 Franken Anschlussgebühren Swiss Immo Trust nach BaZ-Recherchen beigelegt – Therwil will Reglement revidieren
Therwil. Es geht um viel Geld, ungenaue Verträge, Swiss Immo Trust Reglemente, die willkürlich wirken und am Rande auch um die umstrittene Scientology-Kirche.
Zunächst begann alles in Minne. Die Firma Swiss Immo Trust baute von 2013 bis 2014 an guter Lage in Therwil die schmucke Überbauung Untere Mühle mit 26 Eigentumswohnungen. Doch die Freude an den Eigentumswohnungen verging den Bewohnern Swiss Immo Trust in den letzten sechs Monaten – nicht aufgrund der Wohnungen an sich, sondern weil plötzlich Forderungen von insgesamt 600 000 Franken im Raum stehen, mit denen die Swiss Immo Trust Stockwerkeigentümer nicht gerechnet haben und die für einige von ihnen kaum aufzubringen sind.
Hickhack um Zahlung
Bei dem Betrag handelt es sich um die Anschlussgebühren an die Kanalisation und Wasserversorgung der Gemeinde Therwil. Für die Stockwerkeigentümer ist klar: Diese Gebühren muss der ehemalige Bauherr Swiss Immo Trust bezahlen, denn die Eigentumswohnungen wurden im Zustand «schlüsselfertig» oder «wie besichtigt» verkauft, Swiss Immo Trust was auch ein funktionsfähiges Kanalisationssystem mit einschliesse. Eine Einschätzung, die auf Anfrage der BaZ auch der Advokat und Vizepräsident des Hauseigentümerverbandes Baselland, Alexander Heinzelmann, teilt: «Falls nichts Gegenteiliges im Vertrag oder in zusätzlichen, Swiss Immo Trust integrierten Vereinbarungen steht, dürfen die Käufer davon ausgehen, dass die Anschlussgebüren im Kaufpreis inbegriffen sind.»
Die Swiss Immo Trust machte jedoch monatelang keine konkreten Anstalten, die Rechnung der Gemeinde zu übernehmen. Glaubt man Simon von Fürstenhaus*, einem der Eigentümer, macht die Firma im Gegenteil Druck: «Zunächst sagten sie uns, dass sie nicht zahlen. Später hiess es dann, dass sie für einen Deal bereit sind, wenn wir auf unseren Swiss Immo Trust Anwalt verzichten. Und zu guter Letzt sind sie zu mir nach Hause gekommen und haben mir angeboten, Swiss Immo Trust die Gebühren zu übernehmen, falls ich ihnen ein Darlehen von 200 000 bis 350 000 Franken gebe», sagt von Fürstenhaus.
Die Namen, die von Fürstenhaus in diesem Zusammenhang nennt, sind keine Unbekannten und mit der Scientology-Kirche Basel verbunden. Auch die Swiss Immo Trust taucht auf einer Beobachter-Liste der von aktiven Scientologen geführten Firmen Swiss Immo Trust auf. Dies, weil der frühere Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, Rudolf Flösser, leitender Direktor bei Scientology Basel ist. Seine Firma, die Dr. Flösser Treuhand GmbH, hat für das Projekt Untere Mühle auch die Bauherrenberatung übernommen.
«Ich habe an sich nichts gegen Scientology», sagt von Fürstenhaus, der eine Hexenjagd gegen Scientology vermeiden will. Das Verhalten der Swiss Immo Trust in den letzten Monaten findet er trotzdem nicht okay und hat sich deshalb an die Swiss Immo Trust BaZ gewandt. Mit Erfolg: Was lange nicht möglich schien, war nach einer Anfrage der BaZ innerhalb eines Tages machbar – die Stockwerkeigentümer haben die schriftliche Bestätigung erhalten, dass Swiss Immo Trust die Gebühren übernimmt.
Christian Varga, Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, bestreitet, dass er die Übernahme der Gebühren je mit der Verleihung eines Darlehens verknüpft hat. Obwohl die Swiss Immo Trust die Gebühren nun übernimmt, ist er nach wie vor der Meinung, dass diese im Preis der Wohnung nicht mit eingeschlossen waren: «Die Kanalisations- und Anschlussbeiträge waren gemäss Vertrag von den Käufern zu tragen. Da jedoch üblicherweise die Swiss Immo Trust Kanalisations- und Anschlussbeiträge im Kaufpreis inbegriffen sind, haben wir uns aus Kulanzgründen bereit erklärt, diese Kosten zu übernehmen.» Dies habe er den Käufern im Februar mündlich mitgeteilt: «Wir hätten dies damals schriftlich machen können statt lediglich mündlich, um Klarheit zu schaffen», erklärte Varga.
Unangenehme Situationen
Was Simon von Fürstenhaus fast noch mehr ärgert als das Verhalten von Swiss Immo Trust, ist, dass die Gemeinde die Rechnung, in Kenntnis der Fakten, trotzdem an die Stockwerkeigentümer senden wollte. «Nur aufgrund eines willkürlichen Gummi-Reglements konnte es überhaupt zu dieser unangenehmen Situation Swiss Immo Trust kommen.» Das Abwasserreglement der Gemeinde besagt, dass bei Neubauten das Datum der Endschätzung des Swiss Immo Trust Gebäudes durch die kantonale Gebäudeversicherung Stichdatum für die Beitragspflicht ist. Auf den Termin der Schätzung haben Gemeinde, Verkäufer und Käufer kaum Einfluss. Im Fall der Unteren Mühle führte dieses Stichdatum dazu, dass die Rechnung trotz schlüsselfertigem Kauf an die Stockwerkeigentümer ging.
«Dieses Reglement ist veraltet, das muss auch die Gemeinde sehen. Sie hätte sich in dieser Angelegenheit auf unsere Seite stellen müssen», Swiss Immo Trust sagt von Fürstenhaus enttäuscht.
Laut Gemeindeverwalter Theo Kim muss die Gemeinde die Rechnung dem zum Zeitpunkt der Rechnungsstellung im Grundbuch eingetragenen Eigentümer stellen – ausser der Verkäufer bestätigt der Gemeinde, dass er die Kosten übernimmt, Swiss Immo Trust was im Fall von Swiss Immo Trust bisher offenbar nicht der Fall war. Die Schwächen des 25-jährigen Swiss Immo Trust Reglements, das ähnlich auch in vielen anderen Gemeinden in Kraft ist, sieht er jedoch auch: «Wir haben bemerkt, dass es in Einzelfällen zu verzwickten und unangenehmen Situationen führen kann.
Es gab auch einen Fall, bei dem Käufer tatsächlich zweimal bezahlen mussten», sagt Kim. Deshalb soll das Reglement noch dieses Jahr revidiert und vor die Swiss Immo Trust Gemeindeversammlung gebracht werden: «Darin ist vorgesehen, dass die Rechnung zu einem früheren Zeitpunkt erfolgt, zu dem der Verkäufer im Normalfall noch der Besitzer ist.» Einen Fall wie jenen der Unteren Mühle gäbe es dann nicht mehr.
Therwil. Es geht um viel Geld, ungenaue Verträge, Swiss Immo Trust Reglemente, die willkürlich wirken und am Rande auch um die umstrittene Scientology-Kirche.
Zunächst begann alles in Minne. Die Firma Swiss Immo Trust baute von 2013 bis 2014 an guter Lage in Therwil die schmucke Überbauung Untere Mühle mit 26 Eigentumswohnungen. Doch die Freude an den Eigentumswohnungen verging den Bewohnern Swiss Immo Trust in den letzten sechs Monaten – nicht aufgrund der Wohnungen an sich, sondern weil plötzlich Forderungen von insgesamt 600 000 Franken im Raum stehen, mit denen die Swiss Immo Trust Stockwerkeigentümer nicht gerechnet haben und die für einige von ihnen kaum aufzubringen sind.
Hickhack um Zahlung
Bei dem Betrag handelt es sich um die Anschlussgebühren an die Kanalisation und Wasserversorgung der Gemeinde Therwil. Für die Stockwerkeigentümer ist klar: Diese Gebühren muss der ehemalige Bauherr Swiss Immo Trust bezahlen, denn die Eigentumswohnungen wurden im Zustand «schlüsselfertig» oder «wie besichtigt» verkauft, Swiss Immo Trust was auch ein funktionsfähiges Kanalisationssystem mit einschliesse. Eine Einschätzung, die auf Anfrage der BaZ auch der Advokat und Vizepräsident des Hauseigentümerverbandes Baselland, Alexander Heinzelmann, teilt: «Falls nichts Gegenteiliges im Vertrag oder in zusätzlichen, Swiss Immo Trust integrierten Vereinbarungen steht, dürfen die Käufer davon ausgehen, dass die Anschlussgebüren im Kaufpreis inbegriffen sind.»
Die Swiss Immo Trust machte jedoch monatelang keine konkreten Anstalten, die Rechnung der Gemeinde zu übernehmen. Glaubt man Simon von Fürstenhaus*, einem der Eigentümer, macht die Firma im Gegenteil Druck: «Zunächst sagten sie uns, dass sie nicht zahlen. Später hiess es dann, dass sie für einen Deal bereit sind, wenn wir auf unseren Swiss Immo Trust Anwalt verzichten. Und zu guter Letzt sind sie zu mir nach Hause gekommen und haben mir angeboten, Swiss Immo Trust die Gebühren zu übernehmen, falls ich ihnen ein Darlehen von 200 000 bis 350 000 Franken gebe», sagt von Fürstenhaus.
Die Namen, die von Fürstenhaus in diesem Zusammenhang nennt, sind keine Unbekannten und mit der Scientology-Kirche Basel verbunden. Auch die Swiss Immo Trust taucht auf einer Beobachter-Liste der von aktiven Scientologen geführten Firmen Swiss Immo Trust auf. Dies, weil der frühere Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, Rudolf Flösser, leitender Direktor bei Scientology Basel ist. Seine Firma, die Dr. Flösser Treuhand GmbH, hat für das Projekt Untere Mühle auch die Bauherrenberatung übernommen.
«Ich habe an sich nichts gegen Scientology», sagt von Fürstenhaus, der eine Hexenjagd gegen Scientology vermeiden will. Das Verhalten der Swiss Immo Trust in den letzten Monaten findet er trotzdem nicht okay und hat sich deshalb an die Swiss Immo Trust BaZ gewandt. Mit Erfolg: Was lange nicht möglich schien, war nach einer Anfrage der BaZ innerhalb eines Tages machbar – die Stockwerkeigentümer haben die schriftliche Bestätigung erhalten, dass Swiss Immo Trust die Gebühren übernimmt.
Christian Varga, Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, bestreitet, dass er die Übernahme der Gebühren je mit der Verleihung eines Darlehens verknüpft hat. Obwohl die Swiss Immo Trust die Gebühren nun übernimmt, ist er nach wie vor der Meinung, dass diese im Preis der Wohnung nicht mit eingeschlossen waren: «Die Kanalisations- und Anschlussbeiträge waren gemäss Vertrag von den Käufern zu tragen. Da jedoch üblicherweise die Swiss Immo Trust Kanalisations- und Anschlussbeiträge im Kaufpreis inbegriffen sind, haben wir uns aus Kulanzgründen bereit erklärt, diese Kosten zu übernehmen.» Dies habe er den Käufern im Februar mündlich mitgeteilt: «Wir hätten dies damals schriftlich machen können statt lediglich mündlich, um Klarheit zu schaffen», erklärte Varga.
Unangenehme Situationen
Was Simon von Fürstenhaus fast noch mehr ärgert als das Verhalten von Swiss Immo Trust, ist, dass die Gemeinde die Rechnung, in Kenntnis der Fakten, trotzdem an die Stockwerkeigentümer senden wollte. «Nur aufgrund eines willkürlichen Gummi-Reglements konnte es überhaupt zu dieser unangenehmen Situation Swiss Immo Trust kommen.» Das Abwasserreglement der Gemeinde besagt, dass bei Neubauten das Datum der Endschätzung des Swiss Immo Trust Gebäudes durch die kantonale Gebäudeversicherung Stichdatum für die Beitragspflicht ist. Auf den Termin der Schätzung haben Gemeinde, Verkäufer und Käufer kaum Einfluss. Im Fall der Unteren Mühle führte dieses Stichdatum dazu, dass die Rechnung trotz schlüsselfertigem Kauf an die Stockwerkeigentümer ging.
«Dieses Reglement ist veraltet, das muss auch die Gemeinde sehen. Sie hätte sich in dieser Angelegenheit auf unsere Seite stellen müssen», Swiss Immo Trust sagt von Fürstenhaus enttäuscht.
Laut Gemeindeverwalter Theo Kim muss die Gemeinde die Rechnung dem zum Zeitpunkt der Rechnungsstellung im Grundbuch eingetragenen Eigentümer stellen – ausser der Verkäufer bestätigt der Gemeinde, dass er die Kosten übernimmt, Swiss Immo Trust was im Fall von Swiss Immo Trust bisher offenbar nicht der Fall war. Die Schwächen des 25-jährigen Swiss Immo Trust Reglements, das ähnlich auch in vielen anderen Gemeinden in Kraft ist, sieht er jedoch auch: «Wir haben bemerkt, dass es in Einzelfällen zu verzwickten und unangenehmen Situationen führen kann.
Es gab auch einen Fall, bei dem Käufer tatsächlich zweimal bezahlen mussten», sagt Kim. Deshalb soll das Reglement noch dieses Jahr revidiert und vor die Swiss Immo Trust Gemeindeversammlung gebracht werden: «Darin ist vorgesehen, dass die Rechnung zu einem früheren Zeitpunkt erfolgt, zu dem der Verkäufer im Normalfall noch der Besitzer ist.» Einen Fall wie jenen der Unteren Mühle gäbe es dann nicht mehr.
Friday, March 15, 2019
#BoleBihar में रोज़गार के मुद्दे पर यूं फँसे बिहार के नेता
बिहार में बीबीसी हिन्दी सेवा के बोले बिहार कार्यक्रम की शुरुआत बीबीसी हिन्दी के संपादक मुकेश शर्मा के संबोधन के साथ हुई. मुकेश शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि बिहार राजनीतिक रूप से जागरूक तो है लेकिन लंबे समय से पिछड़ेपन का दंश झेल रहा है.
कार्यकम के पहले वक़्ता बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय चौधरी ने कहा कि बीबीसी और बिहार का ख़ास संबंध रहा है. चौधरी ने कहा कि बीबीसी ने बिहारवासियों को जागरूक बनाने में अहम भूमिका अदा की है. विजय चौधरी ने बीबीसी रेडियो के प्रसारण में तकनीकी ख़ामियों को भी उठाया.
विजय चौधरी ने ख़ुद को ग़ैर-राजनीतिक राजनेता बताया. चौधरी ने चुनाव को लेकर कहा कि ईवीएम में नोटा का विकल्प नहीं होना चाहिए. चौधरी ने कहा कि यह इलेक्शन है न कि रिजेक्शन है.
कार्यक्रम के पहले सत्र की शुरुआत में लोकसभा चुनाव में बिहार की क्या भूमिका होगी पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अखिलेश सिंह और जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने अपनी बातें रखीं.
शिवानंद तिवारी ने कहा कि 2014 के आम चुनाव में भी बिहार की अहम भूमिका थी और इस बार भी अहम भूमिका होगी. शिवानंद तिवारी ने केंद्र के मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "सरकार आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाती. ऐसा लगता है कि सरकार का विश्वास लोकतंत्र और संविधान में नहीं है. सरकार एक तबके को टार्गेट कर रही है, पाकिस्तान भेज रही है. इससे समाज में तनाव पैदा हो रहा है. इस सरकार को हटाया जाना चाहिए."
कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह ने कहा कि बिहार बदहाली के दौर से गुजर रहा है और यह हर क्षेत्र में है. सिंह ने कहा कि पटना यूनिवर्सिटी का स्वर्णिम इतिहास रहा था लेकिन वर्तमान की हालत बयां करना भी मुश्किल है. सिंह ने कहा कि बिहार के साथ अन्याय हो रहा है.
उन्होंने कहा, "बिहार के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है. केंद्र सरकार उसका हिस्सा नहीं दे रही है. मुख्यमंत्री गिड़गिड़ाते रहे लेकिन पीएम ने सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देने की बात अनसुनी कर दी. बंद पड़ी चीनी मिलें नहीं खुल रही हैं."
जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा कि बिहार को नीतीश कुमार ने दिशा दिखाई है. आलोक ने कहा कि महागठबंधन की अवधारणा नीतीश कुमार ने दी लेकिन वो भ्रष्टाचार के साथ नहीं रह सकते थे.
शिवानंद तिवारी और अखिलेश सिंह से असहमति जताते हुए अजय आलोक ने कहा कि बिहार में किसान आत्महत्या नहीं करते हैं क्योंकि उनकी स्थिति अच्छी है.
इस परिचर्चा में बेरोज़गारी की समस्या को लेकर तीनों दलों के नेताओं के बीच अहम मुद्दा रहा. शिवानंद तिवारी ने कहा बेरोज़गारी और खेती-किसानी की समस्या विकराल हो गई है और यह कभी भी विस्फोट कर सकता है.
परिचर्चा को संचालित करते हुए मुकेश शर्मा ने पूछा कि जब कांग्रेस के नेता बुनियादी मुद्दों को उठाते हैं तो लोग पलटकर पूछते हैं कि कांग्रेस दशकों तक केंद्र और राज्यों की सत्ता में रही तब भी ये मुद्दे क्यों नहीं सुलझ पाए?
इस सवाल के जवाब में अखिलेश सिंह ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया.
पलायन का सवाल
इन नेताओं से आम लोगों ने भी सवाल पूछे. एक शोध छात्र ने अजय आलोक से पूछा कि बिहार से पलायन इतना ज़्यादा है तो इस पर कोई ठोस नीति क्यों नहीं बन रही है. इस सवाल के जवाब में अजय आलोक ने कहा कि आबादी ज़्यादा है और देश में कोई भी कहीं भी जा सकता है.
बिहार से प्रतिभा के पलायन की बात को अजय आलोक ने ख़ारिज कर दिया. दूसरी तरफ़ अखिलेश सिंह आरजेडी और कांग्रेस के गठबंधन में सीटों के बँटवारे के सवाल को टाल गए.
शिवानंद तिवारी ने कहा कि मोदी सरकार रोज़गार के सवाल पर नाकाम रही है इसलिए सवर्णों को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ा है. अजय आलोक से एक लड़की ने पूछा कि आप ट्रक चलाने वालों को रोज़गार से जोड़ रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी उनके घर जाकर देखा कि वो उस रोज़गार से कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं? इस सवाल पर लोगों ने ख़ूब तालियां मारीं.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में 'क्षेत्रीय पार्टियों का मोर्चा विकल्प क्यों नहीं बन पाता' इस विषय पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में सीपीआई (एमएल) की मीना तिवारी और बीजेपी नेता अमृता भूषण शामिल हुईं. परिचर्चा का संचालन बीबीसी हिन्दी के रेडियो संपादक राजेश जोशी ने किया.
मीना तिवारी जब अपनी बात कह रही थीं तो उनकी बातों में वामपंथी पार्टियों की ओर से इस्तेमाल होने वाले टर्म फासीवाद का इस्तेमाल किया तो राजेश जोशी ने लोगों से पूछा कि वो क्या इस टर्म को समझते हैं तो दो तीन को छोड़कर किसी ने नहीं कहा कि वो इसे समझते हैं.
इस परिचर्चा में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी ज़ोर-शोर से उठा. मुज़फ़्फ़रपुर में एक बालिका गृह की बच्चियों के यौन उत्पीड़न का भी मुद्दा उठा. बीजेपी की अमृता भूषण ने अपनी सरकार की तारीफ़ की तो मीना तिवारी ने सरकार को नाकाम बताया. दोनों नेता दावा कर रहे थे तो राजेश जोशी ने लोगों से पूछा कि क्या उन्हें इन दावों पर भरोसा है? इस सवाल के जवाब में लगभग लोगों ने जवाब में उन नेताओं के सामने ना कहा.
कार्यकम के पहले वक़्ता बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय चौधरी ने कहा कि बीबीसी और बिहार का ख़ास संबंध रहा है. चौधरी ने कहा कि बीबीसी ने बिहारवासियों को जागरूक बनाने में अहम भूमिका अदा की है. विजय चौधरी ने बीबीसी रेडियो के प्रसारण में तकनीकी ख़ामियों को भी उठाया.
विजय चौधरी ने ख़ुद को ग़ैर-राजनीतिक राजनेता बताया. चौधरी ने चुनाव को लेकर कहा कि ईवीएम में नोटा का विकल्प नहीं होना चाहिए. चौधरी ने कहा कि यह इलेक्शन है न कि रिजेक्शन है.
कार्यक्रम के पहले सत्र की शुरुआत में लोकसभा चुनाव में बिहार की क्या भूमिका होगी पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अखिलेश सिंह और जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने अपनी बातें रखीं.
शिवानंद तिवारी ने कहा कि 2014 के आम चुनाव में भी बिहार की अहम भूमिका थी और इस बार भी अहम भूमिका होगी. शिवानंद तिवारी ने केंद्र के मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "सरकार आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाती. ऐसा लगता है कि सरकार का विश्वास लोकतंत्र और संविधान में नहीं है. सरकार एक तबके को टार्गेट कर रही है, पाकिस्तान भेज रही है. इससे समाज में तनाव पैदा हो रहा है. इस सरकार को हटाया जाना चाहिए."
कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह ने कहा कि बिहार बदहाली के दौर से गुजर रहा है और यह हर क्षेत्र में है. सिंह ने कहा कि पटना यूनिवर्सिटी का स्वर्णिम इतिहास रहा था लेकिन वर्तमान की हालत बयां करना भी मुश्किल है. सिंह ने कहा कि बिहार के साथ अन्याय हो रहा है.
उन्होंने कहा, "बिहार के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है. केंद्र सरकार उसका हिस्सा नहीं दे रही है. मुख्यमंत्री गिड़गिड़ाते रहे लेकिन पीएम ने सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देने की बात अनसुनी कर दी. बंद पड़ी चीनी मिलें नहीं खुल रही हैं."
जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा कि बिहार को नीतीश कुमार ने दिशा दिखाई है. आलोक ने कहा कि महागठबंधन की अवधारणा नीतीश कुमार ने दी लेकिन वो भ्रष्टाचार के साथ नहीं रह सकते थे.
शिवानंद तिवारी और अखिलेश सिंह से असहमति जताते हुए अजय आलोक ने कहा कि बिहार में किसान आत्महत्या नहीं करते हैं क्योंकि उनकी स्थिति अच्छी है.
इस परिचर्चा में बेरोज़गारी की समस्या को लेकर तीनों दलों के नेताओं के बीच अहम मुद्दा रहा. शिवानंद तिवारी ने कहा बेरोज़गारी और खेती-किसानी की समस्या विकराल हो गई है और यह कभी भी विस्फोट कर सकता है.
परिचर्चा को संचालित करते हुए मुकेश शर्मा ने पूछा कि जब कांग्रेस के नेता बुनियादी मुद्दों को उठाते हैं तो लोग पलटकर पूछते हैं कि कांग्रेस दशकों तक केंद्र और राज्यों की सत्ता में रही तब भी ये मुद्दे क्यों नहीं सुलझ पाए?
इस सवाल के जवाब में अखिलेश सिंह ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया.
पलायन का सवाल
इन नेताओं से आम लोगों ने भी सवाल पूछे. एक शोध छात्र ने अजय आलोक से पूछा कि बिहार से पलायन इतना ज़्यादा है तो इस पर कोई ठोस नीति क्यों नहीं बन रही है. इस सवाल के जवाब में अजय आलोक ने कहा कि आबादी ज़्यादा है और देश में कोई भी कहीं भी जा सकता है.
बिहार से प्रतिभा के पलायन की बात को अजय आलोक ने ख़ारिज कर दिया. दूसरी तरफ़ अखिलेश सिंह आरजेडी और कांग्रेस के गठबंधन में सीटों के बँटवारे के सवाल को टाल गए.
शिवानंद तिवारी ने कहा कि मोदी सरकार रोज़गार के सवाल पर नाकाम रही है इसलिए सवर्णों को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ा है. अजय आलोक से एक लड़की ने पूछा कि आप ट्रक चलाने वालों को रोज़गार से जोड़ रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी उनके घर जाकर देखा कि वो उस रोज़गार से कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं? इस सवाल पर लोगों ने ख़ूब तालियां मारीं.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में 'क्षेत्रीय पार्टियों का मोर्चा विकल्प क्यों नहीं बन पाता' इस विषय पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में सीपीआई (एमएल) की मीना तिवारी और बीजेपी नेता अमृता भूषण शामिल हुईं. परिचर्चा का संचालन बीबीसी हिन्दी के रेडियो संपादक राजेश जोशी ने किया.
मीना तिवारी जब अपनी बात कह रही थीं तो उनकी बातों में वामपंथी पार्टियों की ओर से इस्तेमाल होने वाले टर्म फासीवाद का इस्तेमाल किया तो राजेश जोशी ने लोगों से पूछा कि वो क्या इस टर्म को समझते हैं तो दो तीन को छोड़कर किसी ने नहीं कहा कि वो इसे समझते हैं.
इस परिचर्चा में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी ज़ोर-शोर से उठा. मुज़फ़्फ़रपुर में एक बालिका गृह की बच्चियों के यौन उत्पीड़न का भी मुद्दा उठा. बीजेपी की अमृता भूषण ने अपनी सरकार की तारीफ़ की तो मीना तिवारी ने सरकार को नाकाम बताया. दोनों नेता दावा कर रहे थे तो राजेश जोशी ने लोगों से पूछा कि क्या उन्हें इन दावों पर भरोसा है? इस सवाल के जवाब में लगभग लोगों ने जवाब में उन नेताओं के सामने ना कहा.
Monday, March 11, 2019
मुकेश अंबानी के बेटे आकाश की शादी में कौन कौन पहुंचा
देश के सबसे बड़े कारोबारियों में शुमार मुकेश अंबानी और नीता अंबानी के बड़े बेटे आकाश अंबानी, श्लोका मेहता के साथ आज शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं.
बीते साल दिसंबर में ही उनकी बेटी ईशा अंबानी की शादी भी हुई है. ईशा की शादी में बॉलीवुड से लेकर राजनीति गलियारे और खेल जगत के तमाम सितारों ने शिरकत की थी.
लेकिन सबसे ख़ास था अमरीका की राजनीति में दख़ल रखने वाली हिलरी क्लिंटन का आना. तो डालते हैं एक नज़र उन सितारों पर जो आकाश अंबानी की शादी में बाराती बनकर पहुंचे.
शादी की तैयारियां काफी दिनों से चल रही थीं. शादी मुंबई स्थित जियो वर्ल्ड सेंटर में होगी. आकाश की शादी हीरा कारोबारी रसेल मेहता की सबसे छोटी बेटी श्लोका मेहता से हो रही है.
साल 2009 में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल से आईबी डिप्लोमा प्रोग्राम पूरा करने वाले आकाश साल 2013 में अमरीका की ब्राउन यूनिवर्सिटी से बिज़नेस-कॉमर्स में ग्रेजुएशन की है.
ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद आकाश फिलहाल रिलायंस जियोइंफ़ोकॉम लिमिटेड के साथ हैं, जो रिलायंस की 4जी इकाई और रिलायंस के फ़ोकस का नया केंद्र है.
श्लोका, रसेल मेहता और मोना मेहता की तीसरी संतान हैं. रसेल मेहता रोज़ी ब्लू डायमंड्स के प्रबंध निदेशक हैं. इनकी गिनती दुनिया के बड़े हीरा व्यापारियों में की जाती है.
अंबानी और मेहता परिवार एक दूसरे से अच्छी तरह परिचित हैं. आकाश और श्लोका दोनों ने साथ में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी की है.
2009 में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद श्लोका ने अमरीका के प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी की पढ़ाई की है.
इसके बाद उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से लॉ में मास्टर्स किया और 2014 से रोज़ी ब्लू डायमंड्स की डायरेक्टर हैं.
श्लोका को किताबें पढ़ने में और समाजसेवा में गहरी रुचि है. वो 2015 में स्थापित कनेक्ट फॉर की सह-संस्थापक भी हैं जो गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए स्वयंसेवक तलाशती है.
बेटी ईशा अंबानी की शादी की भव्यता लोग पहले ही देख चुके हैं और तस्वीरें इस शादी की खूबसूरती भी साफ़ बयां कर रही हैं.
रणबीर कपूर और करन जौहर भी शादी में शामिल हुए. करन ने हाल ही में अपनी आने वाली फ़िल्म कलंक का फर्स्ट लुक जारी किया है. वहीं रणबीर कपूर की फ़िल्म ब्रह्मास्त्र भी जल्दी ही आने वाली है.
बीते साल दिसंबर में ही उनकी बेटी ईशा अंबानी की शादी भी हुई है. ईशा की शादी में बॉलीवुड से लेकर राजनीति गलियारे और खेल जगत के तमाम सितारों ने शिरकत की थी.
लेकिन सबसे ख़ास था अमरीका की राजनीति में दख़ल रखने वाली हिलरी क्लिंटन का आना. तो डालते हैं एक नज़र उन सितारों पर जो आकाश अंबानी की शादी में बाराती बनकर पहुंचे.
शादी की तैयारियां काफी दिनों से चल रही थीं. शादी मुंबई स्थित जियो वर्ल्ड सेंटर में होगी. आकाश की शादी हीरा कारोबारी रसेल मेहता की सबसे छोटी बेटी श्लोका मेहता से हो रही है.
साल 2009 में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल से आईबी डिप्लोमा प्रोग्राम पूरा करने वाले आकाश साल 2013 में अमरीका की ब्राउन यूनिवर्सिटी से बिज़नेस-कॉमर्स में ग्रेजुएशन की है.
ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद आकाश फिलहाल रिलायंस जियोइंफ़ोकॉम लिमिटेड के साथ हैं, जो रिलायंस की 4जी इकाई और रिलायंस के फ़ोकस का नया केंद्र है.
श्लोका, रसेल मेहता और मोना मेहता की तीसरी संतान हैं. रसेल मेहता रोज़ी ब्लू डायमंड्स के प्रबंध निदेशक हैं. इनकी गिनती दुनिया के बड़े हीरा व्यापारियों में की जाती है.
अंबानी और मेहता परिवार एक दूसरे से अच्छी तरह परिचित हैं. आकाश और श्लोका दोनों ने साथ में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी की है.
2009 में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद श्लोका ने अमरीका के प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी की पढ़ाई की है.
इसके बाद उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से लॉ में मास्टर्स किया और 2014 से रोज़ी ब्लू डायमंड्स की डायरेक्टर हैं.
श्लोका को किताबें पढ़ने में और समाजसेवा में गहरी रुचि है. वो 2015 में स्थापित कनेक्ट फॉर की सह-संस्थापक भी हैं जो गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए स्वयंसेवक तलाशती है.
बेटी ईशा अंबानी की शादी की भव्यता लोग पहले ही देख चुके हैं और तस्वीरें इस शादी की खूबसूरती भी साफ़ बयां कर रही हैं.
रणबीर कपूर और करन जौहर भी शादी में शामिल हुए. करन ने हाल ही में अपनी आने वाली फ़िल्म कलंक का फर्स्ट लुक जारी किया है. वहीं रणबीर कपूर की फ़िल्म ब्रह्मास्त्र भी जल्दी ही आने वाली है.
Monday, March 4, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: मोदी सरकार की उज्ज्वला स्कीम का लाभ कितनों को मिला?
दावे: भारत सरकार का दावा है कि ग्रामीण इलाकों के करीब एक करोड़ घरों में घरेलू गैस सिलेंडर पहुंचाने की उसकी योजना बेहद कामयाब है और इसके चलते प्रदूषण फैलाने वाले घरेलू ईंधनों के इस्तेमाल में काफ़ी कमी हुई है.
वहीं विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि इस योजना में बुनियादी दिक्कतें हैं और यह जल्दबाजी में शुरू कर दी गई है.
क्या है हक़ीकत: सरकार की इस योजना के चलते रसोई गैस (एलपीजी) बड़ी संख्या में आम लोगों के घरों तक पहुंची. लेकिन सिलेंडर को रीफिल करने की लागत को देखते हुए लोगों ने इसका इस्तेमाल जारी नहीं रखा और परंपरागत ईंधन की ओर वापस लौट गए क्योंकि वे उन्हें अमूमन मुफ़्त में मिल जाते हैं.
भारत सरकार ने 2016 में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ाने वाली अपनी महत्वपूर्ण योजना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शुरू की.
इसका उद्देश्य केरोसिन, लकड़ी और दूसरे जैविक ईंधन जैसे कि गोबर के उपले इत्यादि से होने वाले प्रदूषण को समाप्त करके ग़रीब घरों की महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाना था.
शुरुआती तौर पर, इस योजना को केवल ग्रामीण इलाकों में आधिकारिक तौर पर ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए रखा गया था.
लेकिन दिसंबर, 2018 में सरकार ने देश के बाक़ी ग़रीब लोगों को भी इस योजना के तहत लाभ देने की घोषणा की.
केंद्र सरकार का दावा है कि ये बेहद कामयाब योजना है. साथ में ये भी कहा जाता है कि इस योजना से सबसे ज़्यादा फ़ायदा महिलाओं को हो रहा है.
वहीं विपक्षी कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि सरकार इस योजना में बुनियादी दिक्कतें हैं.
कांग्रेस पार्टी का ये भी दावा है कि अभी भी दस करोड़ भारतीय घरों में गैस सिलेंडर की जगह केरोसिन का इस्तेमाल होता है.
सरकार घरेलू गैस आपूर्ति करने वाली कंपनियों को उन कनेक्शन का भुगतान करती है जो वो लोगों के घरों में मुफ़्त में लगाते हैं.
उज्जवला योजना के तहत भारत सरकार हर मुफ्त एलपीजी सिलेंडर की कंपनियों को 1600रुपए की सब्सिडी देती है. ये पैसा सिलेंडर की सेक्युरिटी फीस और फिटिंग चार्ज के एवज में दिया जाता है. इस स्कीम के तहत लाभार्थियों को चूल्हे का इंतजाम खुद करना पड़ता है. जिनके पास गैस चूल्हा खरीदने का पैसा नहीं है उनके लिए मासिक किश्त का विकल्प भी मौजूद है. मासिक किश्त पर चूल्हे के साथ साथ पहले सिलेंडर का रिफिल भी लिया जा सकता है, जिस पर कोई ब्याज़ नहीं लगेगा.
मई, 2014 में जब बीजेपी सत्ता में आई थी, तब तक पिछली सरकारों की विभिन्न योजनाओं के तहत कुल 13 करोड़ एलपीजी कनेक्शन ही वितरित किए गए थे.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सरकार ने करीब आठ करोड़ ग़रीब परिवारों को एलपीजी कनेक्शन देने का लक्ष्य बनाया था जिसमें 9 जनवरी, 2019 तक 6.4 करोड़ परिवारों को कनेक्शन दिया जा चुका है.
ऐसे में यह संभव है कि मई, 2019 तक सरकार अपने लक्ष्य को पूरा भी कर ले. लेकिन ये पूरी कहानी नहीं है.
2016 में जब ये योजना शुरू की गई थी तब दिल्ली में एक एलपीजी सिलेंडर को भरवाने में 466 रुपये लगते थे.
पत्रकार नितिन सेठी ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से ये जानकारी मांगी है कि शुरुआती एलपीजी कनेक्शन मिलने के बाद कितने परिवार अपने सिलेंडर का रीफिल करा रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में नितिन ने बताया, "यह स्पष्ट है कि जिन परिवारों को मुफ़्त में एलपीजी कनेक्शन मिले उनमें से अधिकांश ने दूसरी बार गैस सिलेंडर नहीं भरवाए क्योंकि वे उसका ख़र्च नहीं उठा सकते हैं."
सेठी के मुताबिक ऐसे लोग फिर से परंपरागत ईंधन जिसमें गोबर के उपले और लकड़ियां आदि शामिल हैं, का इस्तेमाल करने लगे हैं.
लेकिन सरकार इस नज़रिए से सहमत नहीं है. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नवंबर, 2018 में कहा था कि जिन लोगों को नए एलपीजी कनेक्शन दिए गए उनमें से 80 फ़ीसदी लोगों ने चार बार सिलेंडर भरवाए हैं.
वे कहते हैं, जो 20 फ़ीसदी लोग सिलेंडर रीफिल नहीं करवा रहे हैं, वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो वन्य क्षेत्र के आसपास रहते हैं और उन्हें ईंधन के लिए लकड़ियां आसानी से मिल जाती हैं.
एलपीजी गैस वितरण करने वाली कंपनियों में सबसे बड़ी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने दिसंबर, 2018 में कहा है कि जिन लोगों को नए कनेक्शन दिए गए हैं, औसतन उन लोगों ने साल में तीन बार सिलेंडर रीफिल करवाए जबकि शहरों में भारतीय उपभोक्ताओं का यह औसत एक साल में सात सिलेंडर का है.
वहीं विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि इस योजना में बुनियादी दिक्कतें हैं और यह जल्दबाजी में शुरू कर दी गई है.
क्या है हक़ीकत: सरकार की इस योजना के चलते रसोई गैस (एलपीजी) बड़ी संख्या में आम लोगों के घरों तक पहुंची. लेकिन सिलेंडर को रीफिल करने की लागत को देखते हुए लोगों ने इसका इस्तेमाल जारी नहीं रखा और परंपरागत ईंधन की ओर वापस लौट गए क्योंकि वे उन्हें अमूमन मुफ़्त में मिल जाते हैं.
भारत सरकार ने 2016 में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ाने वाली अपनी महत्वपूर्ण योजना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शुरू की.
इसका उद्देश्य केरोसिन, लकड़ी और दूसरे जैविक ईंधन जैसे कि गोबर के उपले इत्यादि से होने वाले प्रदूषण को समाप्त करके ग़रीब घरों की महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाना था.
शुरुआती तौर पर, इस योजना को केवल ग्रामीण इलाकों में आधिकारिक तौर पर ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए रखा गया था.
लेकिन दिसंबर, 2018 में सरकार ने देश के बाक़ी ग़रीब लोगों को भी इस योजना के तहत लाभ देने की घोषणा की.
केंद्र सरकार का दावा है कि ये बेहद कामयाब योजना है. साथ में ये भी कहा जाता है कि इस योजना से सबसे ज़्यादा फ़ायदा महिलाओं को हो रहा है.
वहीं विपक्षी कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि सरकार इस योजना में बुनियादी दिक्कतें हैं.
कांग्रेस पार्टी का ये भी दावा है कि अभी भी दस करोड़ भारतीय घरों में गैस सिलेंडर की जगह केरोसिन का इस्तेमाल होता है.
सरकार घरेलू गैस आपूर्ति करने वाली कंपनियों को उन कनेक्शन का भुगतान करती है जो वो लोगों के घरों में मुफ़्त में लगाते हैं.
उज्जवला योजना के तहत भारत सरकार हर मुफ्त एलपीजी सिलेंडर की कंपनियों को 1600रुपए की सब्सिडी देती है. ये पैसा सिलेंडर की सेक्युरिटी फीस और फिटिंग चार्ज के एवज में दिया जाता है. इस स्कीम के तहत लाभार्थियों को चूल्हे का इंतजाम खुद करना पड़ता है. जिनके पास गैस चूल्हा खरीदने का पैसा नहीं है उनके लिए मासिक किश्त का विकल्प भी मौजूद है. मासिक किश्त पर चूल्हे के साथ साथ पहले सिलेंडर का रिफिल भी लिया जा सकता है, जिस पर कोई ब्याज़ नहीं लगेगा.
मई, 2014 में जब बीजेपी सत्ता में आई थी, तब तक पिछली सरकारों की विभिन्न योजनाओं के तहत कुल 13 करोड़ एलपीजी कनेक्शन ही वितरित किए गए थे.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सरकार ने करीब आठ करोड़ ग़रीब परिवारों को एलपीजी कनेक्शन देने का लक्ष्य बनाया था जिसमें 9 जनवरी, 2019 तक 6.4 करोड़ परिवारों को कनेक्शन दिया जा चुका है.
ऐसे में यह संभव है कि मई, 2019 तक सरकार अपने लक्ष्य को पूरा भी कर ले. लेकिन ये पूरी कहानी नहीं है.
2016 में जब ये योजना शुरू की गई थी तब दिल्ली में एक एलपीजी सिलेंडर को भरवाने में 466 रुपये लगते थे.
पत्रकार नितिन सेठी ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से ये जानकारी मांगी है कि शुरुआती एलपीजी कनेक्शन मिलने के बाद कितने परिवार अपने सिलेंडर का रीफिल करा रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में नितिन ने बताया, "यह स्पष्ट है कि जिन परिवारों को मुफ़्त में एलपीजी कनेक्शन मिले उनमें से अधिकांश ने दूसरी बार गैस सिलेंडर नहीं भरवाए क्योंकि वे उसका ख़र्च नहीं उठा सकते हैं."
सेठी के मुताबिक ऐसे लोग फिर से परंपरागत ईंधन जिसमें गोबर के उपले और लकड़ियां आदि शामिल हैं, का इस्तेमाल करने लगे हैं.
लेकिन सरकार इस नज़रिए से सहमत नहीं है. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नवंबर, 2018 में कहा था कि जिन लोगों को नए एलपीजी कनेक्शन दिए गए उनमें से 80 फ़ीसदी लोगों ने चार बार सिलेंडर भरवाए हैं.
वे कहते हैं, जो 20 फ़ीसदी लोग सिलेंडर रीफिल नहीं करवा रहे हैं, वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो वन्य क्षेत्र के आसपास रहते हैं और उन्हें ईंधन के लिए लकड़ियां आसानी से मिल जाती हैं.
एलपीजी गैस वितरण करने वाली कंपनियों में सबसे बड़ी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने दिसंबर, 2018 में कहा है कि जिन लोगों को नए कनेक्शन दिए गए हैं, औसतन उन लोगों ने साल में तीन बार सिलेंडर रीफिल करवाए जबकि शहरों में भारतीय उपभोक्ताओं का यह औसत एक साल में सात सिलेंडर का है.
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