在媒体报道中国主要港口大连港不再接收澳大利亚煤炭的消息后,澳大利亚政府表态说,希望北京方面“紧急”澄清有关报道是否属实。
澳大利亚方面希望中国政府把话说得更明白些。但中国外交部发言人耿爽周五已经表示,中国海关对所有进口煤炭,包括澳大利亚煤炭的清关正常。
不过,他在周五和周四都强调 “中国海关根据有关法律法规,对进口煤炭的安全质量进行风险监测和分析并采取相应检验和检测措施。这么做的目的,是更好地维护中国进口企业合法权益、保护环境安全。”
5G疑云
周五,澳大利亚总理斯科特·莫里森(Scott Morrison)也呼吁外界不应匆忙下结论,称这种情况时有发生,没有任何迹象显示此事牵涉到其他更广泛的事件。
尽管如此,外界还是将煤炭进出口问题与澳大利亚禁止在5G网络中采用中国华为设备的决定扯上关系,认为中国对澳大利亚煤炭说“不”,是对澳大利亚采取报复措施。
在媒体报道了大连港口停收澳大利亚煤炭消息后,澳元一度下跌1%。
中国是澳大利亚最大的贸易伙伴,也是澳大利亚矿产最大的出口国。不过,有报道称,澳大利亚运送到大连港口的煤炭大约相当于总大宗出口商品的十分之一,仅占澳大利亚对华出口总量的2%。
因此,澳大利亚央行行长菲利普·罗尔(Philip Lowe)表示,将澳大利亚煤炭的通关手续延迟几个月,并不足以对澳大利亚经济造成什么影响。
中澳之间的煤炭风波或许很快就能平息,但过去几年,中国对外关系中,却有不少政治影响经贸的例子。
2010年,中日在钓鱼岛(日本称尖阁诸岛)发生撞船事件,两国领土主权问题一度白热化,双边关系极为紧张。中国以减少污染和保护资源为理由,宣布开始实施稀土出口配额制。
2010年,挪威的诺贝尔委员会把诺贝尔和平奖颁给中国异见人士刘晓波。中国切断了与挪威的高层联系,还停止进口挪威三文鱼。双边关系直到2012年中国时任总理温家宝与挪威首相见面后才有所改善。
2013年前后,菲律宾与中国就南海问题关系紧张,菲律宾向国际法庭提出仲裁案后,两国关系急剧恶化,菲律宾对中国出口的水果受到严重冲击。2016年,菲律宾新当选的总统杜特尔特采取新的对华政策后,中国才恢复了菲律宾的水果进口。
2016年,台湾大选中,民进党总统候选人蔡英文当选,两岸此前热络的政、经关系不再。输出到大陆的台湾农产品、渔产品都受到影响。
2017年前后,美国在韩国部署导弹防御系统——萨德使中国与韩国关系紧张。在中国设有超市、品牌食品销售、电影院,并投资旅游、金融及各种服务业的韩国乐天集团受到中国的抵制。另外韩国影视明星在中国的演艺活动中国游客赴韩国旅游等也受到限制。
Sunday, February 24, 2019
Tuesday, February 19, 2019
इमरान खान ने कहा- पुलवामा की घटना में हमारा हाथ नहीं; भारत ने हमला किया तो हम भी जवाब देंगे
इस्लामाबाद. प्रधानमंत्री इमरान खान ने पुलवामा हमले में पाकिस्तान का हाथ होने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर भारत ने हमला किया तो इसका करार जवाब दिया जाएगा। हम स्थिरता चाहते हैं, ऐसे में हमले की साजिश क्यों रचेंगे?
उन्होंने यह भी कहा- हम दहशतगर्दी पर भी बात करने को तैयार हैं। भारत सोचे कि कश्मीर के युवा मरने-मारने पर क्यों उतर आए? इमरान के बयान से पहले ही भारतीय सेना ने कहा था- पुलवामा हमले में पाक सेना का हाथ है। 14 फरवरी को पुलवामा के लेथपोरा में हुए फिदायीन हमले में भारत के 40 जवान शहीद हो गए थे। 18 फरवरी को सुरक्षा बलों ने हमले के मास्टरमाइंड कामरान को पुलवामा के पिंगलेना में मार गिराया।
'सऊदी के क्राउन प्रिंस के दौरे की वजह से जवाब नहीं दे पाया'
इमरान ने कहा कि हमारे यहां सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस का दौरा था। इसलिए अब तक जवाब नहीं दिया। हम उनका दौरा लंबे वक्त से तय कर रहे थे। ऐसे में हम क्यों हमले की प्लानिंग करते? इससे हमें क्या फायदा है? आतंकवाद से पाकिस्तान को 100 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है। इसके चलते हमारे यहां 70 हजार लोगों की जान जा चुकी है।
'नया पाकिस्तान दहशतगर्दी की तरफ क्यों जाएगा'
पाक प्रधानमंत्री ने कहा कि जब पाकिस्तान स्थायित्व की तरफ जा रहा है, तब हम क्यों दहशतगर्दी की तरफ जाएंगे? मैं भारत सरकार से कहना चाहता हूं कि आप बार-बार पाक को क्यों जिम्मेदार बताते रहेंगे। हम स्टेबिलिटी चाहते हैं। हमारा अब नया पाकिस्तान है। आप किसी भी तरह की जांच कराना चाहते है तो हमें बताएं। हम एक्शन लेंगे। ये इसलिए लेंगे क्योंकि अगर कोई पाकिस्तान की जमीन इस्तेमाल कर रहा है तो कार्रवाई होगी।
'कोई सबूत हो तो हमें दें'
इमरान ने कहा, "मैं भारत से कहता हूं कि आपके पास कोई सबूत है तो मैं गारंटी देता हूं कि हम कार्रवाई करेंगे। ऐसा किसी के दबाव में नहीं कर रहे। हम आतंकवाद पर बात करने के लिए तैयार है। हम इससे सबसे ज्यादा परेशान हैं। कश्मीर के युवा इस हद तक उतर चुके हैं, कोई तो वजह होगी।"
उन्होंने यह भी कहा, "आपके इलेक्शन का टाइम है। अगर आप समझते हैं कि पाकिस्तान पर किसी तरह का हमला करेंगे। तो पाकिस्तान रिटेलिएट (जवाबी कार्रवाई) करेगा। हम सब जानते हैं कि जंग शुरू करना इंसान का काम है, लेकिन खत्म करना नहीं। ये किस तरफ जाएगा, ये तो अल्लाह ही जानता है। ये मसला अफगानिस्तान की तरह बातचीत से ही हल होगा।"
उन्होंने यह भी कहा- हम दहशतगर्दी पर भी बात करने को तैयार हैं। भारत सोचे कि कश्मीर के युवा मरने-मारने पर क्यों उतर आए? इमरान के बयान से पहले ही भारतीय सेना ने कहा था- पुलवामा हमले में पाक सेना का हाथ है। 14 फरवरी को पुलवामा के लेथपोरा में हुए फिदायीन हमले में भारत के 40 जवान शहीद हो गए थे। 18 फरवरी को सुरक्षा बलों ने हमले के मास्टरमाइंड कामरान को पुलवामा के पिंगलेना में मार गिराया।
'सऊदी के क्राउन प्रिंस के दौरे की वजह से जवाब नहीं दे पाया'
इमरान ने कहा कि हमारे यहां सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस का दौरा था। इसलिए अब तक जवाब नहीं दिया। हम उनका दौरा लंबे वक्त से तय कर रहे थे। ऐसे में हम क्यों हमले की प्लानिंग करते? इससे हमें क्या फायदा है? आतंकवाद से पाकिस्तान को 100 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है। इसके चलते हमारे यहां 70 हजार लोगों की जान जा चुकी है।
'नया पाकिस्तान दहशतगर्दी की तरफ क्यों जाएगा'
पाक प्रधानमंत्री ने कहा कि जब पाकिस्तान स्थायित्व की तरफ जा रहा है, तब हम क्यों दहशतगर्दी की तरफ जाएंगे? मैं भारत सरकार से कहना चाहता हूं कि आप बार-बार पाक को क्यों जिम्मेदार बताते रहेंगे। हम स्टेबिलिटी चाहते हैं। हमारा अब नया पाकिस्तान है। आप किसी भी तरह की जांच कराना चाहते है तो हमें बताएं। हम एक्शन लेंगे। ये इसलिए लेंगे क्योंकि अगर कोई पाकिस्तान की जमीन इस्तेमाल कर रहा है तो कार्रवाई होगी।
'कोई सबूत हो तो हमें दें'
इमरान ने कहा, "मैं भारत से कहता हूं कि आपके पास कोई सबूत है तो मैं गारंटी देता हूं कि हम कार्रवाई करेंगे। ऐसा किसी के दबाव में नहीं कर रहे। हम आतंकवाद पर बात करने के लिए तैयार है। हम इससे सबसे ज्यादा परेशान हैं। कश्मीर के युवा इस हद तक उतर चुके हैं, कोई तो वजह होगी।"
उन्होंने यह भी कहा, "आपके इलेक्शन का टाइम है। अगर आप समझते हैं कि पाकिस्तान पर किसी तरह का हमला करेंगे। तो पाकिस्तान रिटेलिएट (जवाबी कार्रवाई) करेगा। हम सब जानते हैं कि जंग शुरू करना इंसान का काम है, लेकिन खत्म करना नहीं। ये किस तरफ जाएगा, ये तो अल्लाह ही जानता है। ये मसला अफगानिस्तान की तरह बातचीत से ही हल होगा।"
Tuesday, February 12, 2019
13 प्वाइंट रोस्टर के बारे में वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं
अगर आप किसी दफ़्तर में काम करते हैं तो 'रोस्टर' शब्द आपके लिए नया नहीं होगा. आपको किस दिन, किस शिफ़्ट में जाना है और किस दिन घर पर आराम फ़रमाना है, ये इस रोस्टर से ही तय होता है.
लेकिन बीते कुछ हफ़्तों से ये शब्द सड़कों पर भी सुनने को मिला और सदन की बैठकों में भी. 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर एसटी, एससी और ओबीसी वर्ग सरकार से ख़ासा नाराज़ है. उनकी मांग है कि सरकार इसमें हस्तक्षेप करके इसमें बदलाव लाए .
दरअसल, 13 प्वाइंट रोस्टर वो प्रणाली है जिससे आने वाले समय में विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्तियां की जाएंगी. हालांकि इसके विरोध में कई सप्ताह से अध्यापकों का एक बड़ा वर्ग प्रदर्शन कर रहा है जिसके बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस पर पुनर्विचार कर अध्यादेश लाने की बात कही है.
यहां तक कि आरएसएस से जुड़ा अध्यापकों का एक संगठन एनडीटीएफ़ (नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ़्रन्ट) के अजय भागी भी कहते हैं कि 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम से ही नियुक्तियां होनी चाहिए, जैसा कि अब तक होता आया है.
पहले अध्यापकों की नियुक्ति के लिए यूनिवर्सिटी को एक इकाई के तौर पर माना जाता था और आरक्षण के अनुसार अध्यापक पद पर नियुक्तियां दी जाती थीं. लेकिन अब इस नए नियम के मुताबिक, विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति विभाग के आधार पर की जाएगी.
यानी अब ईकाई विश्वविद्यालय नहीं बल्कि विभाग होंगे. पहले नियुक्तियां 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर की जाती थीं लेकिन अब इसे 13 प्वाइंट रोस्टर बना दिया गया है. इसे 'एल शेप' रोस्टर भी कहते हैं.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2017 में शैक्षणिक पदों पर भर्ती के लिए संस्थान के आधार पर आरक्षण निर्धारित करने के सर्कुलर को ख़ारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर नहीं होकर, 13 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर हो. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को जारी रखा.
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर और डूटा के सदस्य राजेश झा कहते हैं "अब तक यूनिवर्सिटी और कॉलेज को यूनिट मानकर आरक्षण दिया जाता था और ये 200 प्वाइंट रोस्टर था. इसमें एक से लेकर 200 प्वाइंट तक जाते थे. मान लें कि पहला पद जनरल है, दूसरा पद जनरल है, तीसरा पद जनरल है तो चौथा पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो जाएगा और इसी तरह आगे के भी आरक्षण निर्धारित हो जाते थे लेकिन 13 प्वाइंट रोस्टर में हमारी सीमा कम हो गई है. हम सिर्फ़ 13 प्वाइंट तक जा सकते हैं और इस वजह से आरक्षण पूरा नहीं हो पाता."
राजेश झा बताते हैं कि 13 प्वाइंट रोस्टर की वजह से रिज़र्व कैटेगरी की सीटें कम हो रही हैं.
वो कहते हैं कि इस रोस्टर सिस्टम का सबसे ज़्यादा असर उन डिपार्टमेंट्स पर पड़ेगा जो काफी छोटे हैं. क्योंकि किसी छोटे डिपार्टमेंट में एक साथ 13-14 सीटें आएं, ऐसा होने की संभावना बहुत कम होती है.
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सी मंडल भी इस बात पर सहमति जताते हैं.
200 प्वाइंट रोस्टर को ख़त्म करके 13 प्वाइंट रोस्टर लाए जाने को वो आरक्षण के लिए ख़तरा बताते हैं. वो कहते हैं जब 200 पर्सेंट या प्वाइंट रोस्टर सिस्टम था तो इसमें 49.5 पर्सेंट पद आरक्षित होते थे और 50.5 प्रतिशत पद अनारक्षित. लेकिन 13 प्वाइंट रोस्टर आ जाने के बाद आप सभी आरक्षित पदों को पूरा नहीं कर सकते.
इसके तहत...
शुरू के तीन पद अनारक्षित होंगे और इसके बाद चौथा पद ओबीसी को जाएगा
इसके बाद सातवां पद एससी को मिलेगा
फिर आठवां पद ओबीसी को मिलेगा और इसके बाद
अगर डिपार्टमेंट में 14 वां पद आता है तब जाकर वो एसटी को मिलेगा.
दिलीप मंडल कहते हैं, "अगर 13 प्वाइंट रोस्टर को ईमानदारी से लागू कर भी दें तो भी हम रिज़र्व कैटेगरी को 30 फ़ीसदी ही संतुष्ट कर पाएंगे जबकि अभी केंद्र सरकार में 49.5 प्रतिशत रिज़र्वेशन का प्रावधान है."
प्रोफ़ेसर राजेश कहते हैं कि आजकल इंटर-डिसीप्लीनरी कोर्सेज़ की संख्या बढ़ गई है जिससे डिपार्टमेंट छोटे हो गए हैं, ऐसे में इन विभागों के लिए तो कभी रिज़र्वेशन की सीटें आएंगी ही नहीं.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि 13 प्वाइंट रोटा को भले ही ये कहकर फैलाया जा रहा हो कि इससे नियुक्तियों में धांधलियां कम होंगी लेकिन ऐसा नहीं है.
वो कहते हैं, "ये तो सीधे तौर पर धांधली है. खुल्लम-खुल्ला आरक्षण को ख़त्म किया जा रहा है."
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इसे लेकर कैसी प्रतिक्रिया है?
इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "यहां प्रोफ़ेसर दो धड़े में बंटे नज़र आते हैं. जो स्वयं आरक्षित वर्ग से आए हैं वो इसके नुक़सान गिनाते हैं और जो अनारक्षित वर्ग से आए हैं वो इसे बेहतर पहल बताते हैं."
डूटा (दिल्ली विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन) के पूर्व प्रेसिंडेट और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आदित्य नारायण इस रोस्टर का एक और बड़ा नुक़सान बताते हैं. वो कहते हैं. "13 प्वाइंट रोस्टर में रिज़र्वेशन कैटेगरी के लिए तो जो नुक़सान है वो है ही लेकिन एक बड़ा मुद्दा ये भी है कि दिल्ली विश्वदिद्यालय में सैकड़ों टीचर अस्थाई तौर पर सालों से काम कर रहे हैं. उन सभी ने 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर ज्वाइन किया था और अब जब 13 प्वाइंट रोस्टर लागू हो जाएगा तो उनका भविष्य भी ख़तरे में पड़ जाएगा."
लेकिन बीते कुछ हफ़्तों से ये शब्द सड़कों पर भी सुनने को मिला और सदन की बैठकों में भी. 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर एसटी, एससी और ओबीसी वर्ग सरकार से ख़ासा नाराज़ है. उनकी मांग है कि सरकार इसमें हस्तक्षेप करके इसमें बदलाव लाए .
दरअसल, 13 प्वाइंट रोस्टर वो प्रणाली है जिससे आने वाले समय में विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्तियां की जाएंगी. हालांकि इसके विरोध में कई सप्ताह से अध्यापकों का एक बड़ा वर्ग प्रदर्शन कर रहा है जिसके बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस पर पुनर्विचार कर अध्यादेश लाने की बात कही है.
यहां तक कि आरएसएस से जुड़ा अध्यापकों का एक संगठन एनडीटीएफ़ (नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ़्रन्ट) के अजय भागी भी कहते हैं कि 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम से ही नियुक्तियां होनी चाहिए, जैसा कि अब तक होता आया है.
पहले अध्यापकों की नियुक्ति के लिए यूनिवर्सिटी को एक इकाई के तौर पर माना जाता था और आरक्षण के अनुसार अध्यापक पद पर नियुक्तियां दी जाती थीं. लेकिन अब इस नए नियम के मुताबिक, विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति विभाग के आधार पर की जाएगी.
यानी अब ईकाई विश्वविद्यालय नहीं बल्कि विभाग होंगे. पहले नियुक्तियां 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर की जाती थीं लेकिन अब इसे 13 प्वाइंट रोस्टर बना दिया गया है. इसे 'एल शेप' रोस्टर भी कहते हैं.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2017 में शैक्षणिक पदों पर भर्ती के लिए संस्थान के आधार पर आरक्षण निर्धारित करने के सर्कुलर को ख़ारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर नहीं होकर, 13 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर हो. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को जारी रखा.
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर और डूटा के सदस्य राजेश झा कहते हैं "अब तक यूनिवर्सिटी और कॉलेज को यूनिट मानकर आरक्षण दिया जाता था और ये 200 प्वाइंट रोस्टर था. इसमें एक से लेकर 200 प्वाइंट तक जाते थे. मान लें कि पहला पद जनरल है, दूसरा पद जनरल है, तीसरा पद जनरल है तो चौथा पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो जाएगा और इसी तरह आगे के भी आरक्षण निर्धारित हो जाते थे लेकिन 13 प्वाइंट रोस्टर में हमारी सीमा कम हो गई है. हम सिर्फ़ 13 प्वाइंट तक जा सकते हैं और इस वजह से आरक्षण पूरा नहीं हो पाता."
राजेश झा बताते हैं कि 13 प्वाइंट रोस्टर की वजह से रिज़र्व कैटेगरी की सीटें कम हो रही हैं.
वो कहते हैं कि इस रोस्टर सिस्टम का सबसे ज़्यादा असर उन डिपार्टमेंट्स पर पड़ेगा जो काफी छोटे हैं. क्योंकि किसी छोटे डिपार्टमेंट में एक साथ 13-14 सीटें आएं, ऐसा होने की संभावना बहुत कम होती है.
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सी मंडल भी इस बात पर सहमति जताते हैं.
200 प्वाइंट रोस्टर को ख़त्म करके 13 प्वाइंट रोस्टर लाए जाने को वो आरक्षण के लिए ख़तरा बताते हैं. वो कहते हैं जब 200 पर्सेंट या प्वाइंट रोस्टर सिस्टम था तो इसमें 49.5 पर्सेंट पद आरक्षित होते थे और 50.5 प्रतिशत पद अनारक्षित. लेकिन 13 प्वाइंट रोस्टर आ जाने के बाद आप सभी आरक्षित पदों को पूरा नहीं कर सकते.
इसके तहत...
शुरू के तीन पद अनारक्षित होंगे और इसके बाद चौथा पद ओबीसी को जाएगा
इसके बाद सातवां पद एससी को मिलेगा
फिर आठवां पद ओबीसी को मिलेगा और इसके बाद
अगर डिपार्टमेंट में 14 वां पद आता है तब जाकर वो एसटी को मिलेगा.
दिलीप मंडल कहते हैं, "अगर 13 प्वाइंट रोस्टर को ईमानदारी से लागू कर भी दें तो भी हम रिज़र्व कैटेगरी को 30 फ़ीसदी ही संतुष्ट कर पाएंगे जबकि अभी केंद्र सरकार में 49.5 प्रतिशत रिज़र्वेशन का प्रावधान है."
प्रोफ़ेसर राजेश कहते हैं कि आजकल इंटर-डिसीप्लीनरी कोर्सेज़ की संख्या बढ़ गई है जिससे डिपार्टमेंट छोटे हो गए हैं, ऐसे में इन विभागों के लिए तो कभी रिज़र्वेशन की सीटें आएंगी ही नहीं.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि 13 प्वाइंट रोटा को भले ही ये कहकर फैलाया जा रहा हो कि इससे नियुक्तियों में धांधलियां कम होंगी लेकिन ऐसा नहीं है.
वो कहते हैं, "ये तो सीधे तौर पर धांधली है. खुल्लम-खुल्ला आरक्षण को ख़त्म किया जा रहा है."
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इसे लेकर कैसी प्रतिक्रिया है?
इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "यहां प्रोफ़ेसर दो धड़े में बंटे नज़र आते हैं. जो स्वयं आरक्षित वर्ग से आए हैं वो इसके नुक़सान गिनाते हैं और जो अनारक्षित वर्ग से आए हैं वो इसे बेहतर पहल बताते हैं."
डूटा (दिल्ली विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन) के पूर्व प्रेसिंडेट और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आदित्य नारायण इस रोस्टर का एक और बड़ा नुक़सान बताते हैं. वो कहते हैं. "13 प्वाइंट रोस्टर में रिज़र्वेशन कैटेगरी के लिए तो जो नुक़सान है वो है ही लेकिन एक बड़ा मुद्दा ये भी है कि दिल्ली विश्वदिद्यालय में सैकड़ों टीचर अस्थाई तौर पर सालों से काम कर रहे हैं. उन सभी ने 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर ज्वाइन किया था और अब जब 13 प्वाइंट रोस्टर लागू हो जाएगा तो उनका भविष्य भी ख़तरे में पड़ जाएगा."
Tuesday, February 5, 2019
ममता बनाम सीबीआई विवाद ने हरे किए शारदा निवेशकों के घाव
पश्चिम बंगाल में चिटफंड घोटालों की जांच कर रही सीबीआई और कोलकाता पुलिस के बीच उभरे विवाद ने लाखों निवेशकों के घाव हरे कर दिए हैं.
शारदा समूह की चिटफंड कंपनी ने छह साल पहले देवारती और हीरालाल जैसे लाखों ग़रीबों के सपने लील लिए थे. घोटाले के सामने आने के बाद इन लोगों ने साल भर तक इस उम्मीद में आंदोलन और प्रदर्शन किया था कि ब्याज नहीं तो शायद उनकी जमापूंजी भी वापस मिल जाए.
लेकिन चारो ओर से हताश होने के बाद इनमें से कइयों ने रोज़गार का ज़रिया बदल लिया. अब कोई छोटी-सी दुकान चला कर अपने घर-परिवार का पेट पाल रहा है तो कोई मेहनत-मज़दूरी कर या सब्जियां बेच कर. लेकिन इनके जख़्म एक बार फिर रिसने लगे हैं.
बीबीसी ने कुछ ऐसे ही लोगों से बात कर उनकी मौजूदा स्थिति जानने का प्रयास किया.
50 साल की देवारती लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगा कर अपना पेट पालती थी. उस कमाई से उनके पूरे परिवार को ढंग से दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती थी.
लेकिन पेट काट-काट कर उन्होंने वर्ष 2011 में मीडिया, रियल एस्टेट और चिटफंड का कारोबार करने वाली शारदा समूह की एक कंपनी में दस हजार रुपए का एक फिक्स्ड डिपॉजिट किया था.
पढ़ें- ममता- मोदी, पुलिस- सीबीआई के उलझने की कहानी
एजेंट ने उनको लालच दिया था कि सात साल बाद 10 हजार की रक़म के एवज में उनको एक लाख रुपए मिलेंगे. लेकिन अप्रैल, 2013 में इस समूह पर ताला लगने और मालिक के फ़रार होने की ख़बरों के बाद से ही उनकी आंखों से नींद ग़ायब हो गई थी.
उनको अपने मेहनत के पैसे भी डूबते नज़र आ रहे थे. अब वह महानगर में हरी सब्जियां बेच कर किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ करती हैं.
देवारती कहती है, "सबकुछ एक बुरे सपने की तरह था. एजेंट ने सब्जबाग दिखा कर शारदा की योजनाओं में निवेश कराया था."
कंपनी बंद होने की ख़बर से देवारती की आंखों के आंग अंधेरा छा गया था. उसके गांव से लगभग हर घर के लोगों ने अपनी मामूली कमाई से पेट काट-काट कर इन योजनाओं में पैसे लगाए थे.
साल भर तक तो उन्हें उम्मीद थी कि पैसे मिल जाएंगे. लेकिन बाद में वह भी बुझ गई. वह कहती है, "ताज़ा मामले में हम जैसे तमाम लोगों के घावों को हरा कर दिया है. ग़रीबों को लूटने वालों को बद्दुआ लगेगी."
शारदा घोटाले ने ली जान
देवारती की पड़ोसी उर्मिला ने अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे डूबने के गम में आत्महत्या ही कर ली थी. देवारती बताती है, "उर्मिला के परिवार को बीते पांच-छह साल से भारी दिक्कतों से जूझना पड़ रहा है. उसके दो बेटे कचरा बीन कर पेट पालते हैं."
कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले में रहने वाले मोहन दास ने साल 2011 में एक निजी कंपनी से सेवानिवृत्त होने के बाद मिली तीन लाख की रकम शारदा कंपनी की एक ऐसी ही योजना में जमा कर दी थी. अब वे आज तक उस घड़ी को कोस रहे हैं.
पढ़ें- वो राजीव कुमार, जिनके लिए ममता बैठ गईं धरने पर
मोहन बताते हैं, "शारदा समूह के स्थानीय एजेंट ने तीन साल में रकम दोगुनी और पांच साल में तिगुनी होने का वादा किया था. मैंने तिगुनी रकम पाने के लालच में वह पैसे लगाए थे. लेकिन अपनी रकम पाना तो दूर, मेरा बुढ़ापे का सहारा भी छिन गया. कंपनी दो साल में ही बंद हो गई."
मोहन ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है. उनको लगता है कि सीबीआई जांच के बाद शायद सरकार निवेशकों की रकम लौटाने का कोई इंतजाम करे. हालांकि यह उम्मीद खोखली है, यह बात वे खुद भी जानते हैं. अब वे अपने मोहल्ले में चाय की छोटी-सी दुकान चला कर अपना पेट पालते हैं.
दक्षिण 24-परगना के बासंती इलाक़े की रहने वाली 79 साल की मानसी बेरा ने अपने पूरे जीवन की कमाई लगभग एक लाख रुपए एक चिटफंड योजना में जमा कर दी थी.
एजेंट ने उनको काफ़ी सब्जबाग दिखाए थे. मानसी कहती है, "सब बर्बाद हो गया. कंपनी बंद होने की खबरें सामने आने के बाद मैं महीनों ठीक से सो नहीं पाई. अब मुझे घर चलाने के लिए इस उम्र में भी रोजाना सब्जियां बेचनी पड़ती है."
मानसी पर अपने दो पोते-पोतियों की जिम्मेदारी है. उसके बेटे का असमय ही निधन हो गया और बहू ने घर छोड़ दिया.
'ज़िल्लत की वजह से आत्महत्या की आत्महत्या'
शारदा समूह ने ग्रामीण इलाकों से चिटफंड योजनाओं के लिए पैसे उगाहने की खातिर स्थानीय युवकों को मोटे कमीशन पर एजेंट बनाया था. इनको हर महीने 30 से 40 फीसदी तक कमीशन मिलता था. बर्दवान के मनोरंजन माइती भी ऐसे ही एक एजेंट थे. उस दौर में उन्होंने महीने में एक-एक लाख रुपए तक कमाए थे.
शारदा समूह की चिटफंड कंपनी ने छह साल पहले देवारती और हीरालाल जैसे लाखों ग़रीबों के सपने लील लिए थे. घोटाले के सामने आने के बाद इन लोगों ने साल भर तक इस उम्मीद में आंदोलन और प्रदर्शन किया था कि ब्याज नहीं तो शायद उनकी जमापूंजी भी वापस मिल जाए.
लेकिन चारो ओर से हताश होने के बाद इनमें से कइयों ने रोज़गार का ज़रिया बदल लिया. अब कोई छोटी-सी दुकान चला कर अपने घर-परिवार का पेट पाल रहा है तो कोई मेहनत-मज़दूरी कर या सब्जियां बेच कर. लेकिन इनके जख़्म एक बार फिर रिसने लगे हैं.
बीबीसी ने कुछ ऐसे ही लोगों से बात कर उनकी मौजूदा स्थिति जानने का प्रयास किया.
50 साल की देवारती लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगा कर अपना पेट पालती थी. उस कमाई से उनके पूरे परिवार को ढंग से दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती थी.
लेकिन पेट काट-काट कर उन्होंने वर्ष 2011 में मीडिया, रियल एस्टेट और चिटफंड का कारोबार करने वाली शारदा समूह की एक कंपनी में दस हजार रुपए का एक फिक्स्ड डिपॉजिट किया था.
पढ़ें- ममता- मोदी, पुलिस- सीबीआई के उलझने की कहानी
एजेंट ने उनको लालच दिया था कि सात साल बाद 10 हजार की रक़म के एवज में उनको एक लाख रुपए मिलेंगे. लेकिन अप्रैल, 2013 में इस समूह पर ताला लगने और मालिक के फ़रार होने की ख़बरों के बाद से ही उनकी आंखों से नींद ग़ायब हो गई थी.
उनको अपने मेहनत के पैसे भी डूबते नज़र आ रहे थे. अब वह महानगर में हरी सब्जियां बेच कर किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ करती हैं.
देवारती कहती है, "सबकुछ एक बुरे सपने की तरह था. एजेंट ने सब्जबाग दिखा कर शारदा की योजनाओं में निवेश कराया था."
कंपनी बंद होने की ख़बर से देवारती की आंखों के आंग अंधेरा छा गया था. उसके गांव से लगभग हर घर के लोगों ने अपनी मामूली कमाई से पेट काट-काट कर इन योजनाओं में पैसे लगाए थे.
साल भर तक तो उन्हें उम्मीद थी कि पैसे मिल जाएंगे. लेकिन बाद में वह भी बुझ गई. वह कहती है, "ताज़ा मामले में हम जैसे तमाम लोगों के घावों को हरा कर दिया है. ग़रीबों को लूटने वालों को बद्दुआ लगेगी."
शारदा घोटाले ने ली जान
देवारती की पड़ोसी उर्मिला ने अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे डूबने के गम में आत्महत्या ही कर ली थी. देवारती बताती है, "उर्मिला के परिवार को बीते पांच-छह साल से भारी दिक्कतों से जूझना पड़ रहा है. उसके दो बेटे कचरा बीन कर पेट पालते हैं."
कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले में रहने वाले मोहन दास ने साल 2011 में एक निजी कंपनी से सेवानिवृत्त होने के बाद मिली तीन लाख की रकम शारदा कंपनी की एक ऐसी ही योजना में जमा कर दी थी. अब वे आज तक उस घड़ी को कोस रहे हैं.
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मोहन बताते हैं, "शारदा समूह के स्थानीय एजेंट ने तीन साल में रकम दोगुनी और पांच साल में तिगुनी होने का वादा किया था. मैंने तिगुनी रकम पाने के लालच में वह पैसे लगाए थे. लेकिन अपनी रकम पाना तो दूर, मेरा बुढ़ापे का सहारा भी छिन गया. कंपनी दो साल में ही बंद हो गई."
मोहन ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है. उनको लगता है कि सीबीआई जांच के बाद शायद सरकार निवेशकों की रकम लौटाने का कोई इंतजाम करे. हालांकि यह उम्मीद खोखली है, यह बात वे खुद भी जानते हैं. अब वे अपने मोहल्ले में चाय की छोटी-सी दुकान चला कर अपना पेट पालते हैं.
दक्षिण 24-परगना के बासंती इलाक़े की रहने वाली 79 साल की मानसी बेरा ने अपने पूरे जीवन की कमाई लगभग एक लाख रुपए एक चिटफंड योजना में जमा कर दी थी.
एजेंट ने उनको काफ़ी सब्जबाग दिखाए थे. मानसी कहती है, "सब बर्बाद हो गया. कंपनी बंद होने की खबरें सामने आने के बाद मैं महीनों ठीक से सो नहीं पाई. अब मुझे घर चलाने के लिए इस उम्र में भी रोजाना सब्जियां बेचनी पड़ती है."
मानसी पर अपने दो पोते-पोतियों की जिम्मेदारी है. उसके बेटे का असमय ही निधन हो गया और बहू ने घर छोड़ दिया.
'ज़िल्लत की वजह से आत्महत्या की आत्महत्या'
शारदा समूह ने ग्रामीण इलाकों से चिटफंड योजनाओं के लिए पैसे उगाहने की खातिर स्थानीय युवकों को मोटे कमीशन पर एजेंट बनाया था. इनको हर महीने 30 से 40 फीसदी तक कमीशन मिलता था. बर्दवान के मनोरंजन माइती भी ऐसे ही एक एजेंट थे. उस दौर में उन्होंने महीने में एक-एक लाख रुपए तक कमाए थे.
Sunday, February 3, 2019
ऋषि कुमार शुक्ला: कमलनाथ ने डीजीपी पद से हटाया, मोदी सरकार ने सीबीआई प्रमुख बनाया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने शनिवार को आईपीएस अधिकारी ऋषि कुमार शुक्ला को भारत की प्रमुख जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई का नया निदेशक बनाया है.
सीबीआई प्रमुख का पद पूर्व निदेशक आलोक वर्मा का ट्रांसफर होने के बाद 10 जनवरी से खाली पड़ा हुआ था.
अब मध्य प्रदेश के डीजीपी रहे ऋषि कुमार शुक्ला को इस पद की ज़िम्मेदारी दी गई है.
ऋषि कुमार शुक्ला 1983 बैच के मध्य प्रदेश काडर के अफसर हैं. ये पहला मौक़ा है जब मध्य प्रदेश काडर के किसी आईपीएस अधिकारी को सीबीआई प्रमुख बनाया गया है.
यह भी संयोग है कि 'रॉ' और सीबीआई दोनों के प्रमुख पहली बार मध्य प्रदेश काडर के हैं. 'रॉ' प्रमुख मध्य प्रदेश कैडर के अनिल धसमाना हैं.
ऋषि कुमार शुक्ला को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का क़रीबी माना जाता है. दोनों इंटेलिजेंस ब्यूरो में साथ काम कर चुके हैं.
शुक्ला मूल रूप से मध्य प्रदेश के ग्वालियर के रहने वाले हैं और वहीं के शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज से बीकॉम में ग्रेजुएट हैं. वे अभी तक मध्य प्रदेश के डीजीपी थे.
मध्य प्रदेश में सरकार बदलने के बाद चार दिन पहले ही कमलनाथ सरकार ने उन्हें पुलिस हाउसिंग कार्पोरेशन का चेयरमैन बनाया था.
इस पद को पुलिस विभाग में डीजीपी के पद के मुक़ाबले छोटा माना जाता है. कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमिटी ने शनिवार को उनके नाम पर मुहर लगाई.
उन्हें दो साल के लिए सीबीआई निदेशक पद पर नियुक्त किया गया है. अभी नागेश्वर राव सीबीआई के अंतरिम निदेशक के तौर पर काम कर रहे हैं.
सीबीआई के नए निदेशक के चयन को लेकर शुक्रवार को दूसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति की बैठक हुई थी.
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोकसभा में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऋषि कुमार शुक्ला के चयन पर सवाल उठाया है. खड़गे भी इस चयन समिति के अध्यक्ष थे.
खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी असहमति जताई है.
उन्होंने शुक्ला की नियुक्ति पर कहा है कि उनके पास भ्रष्टाचार के मामलों को निपटाने का कोई अनुभव नहीं है, इसलिए उन्हें निदेशक नहीं बनाया जाना चाहिए.
खड़गे की आपत्ति पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कांग्रेस नेता चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर चाहते हैं कि वो अपने पसंद के अधिकारी को निदेशक बनाएं.
सिंह ने कहा कि इस चयन समिति के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई शुक्ला की नियुक्ति पर पूरी तरह से सहमत हैं.
शुक्ला को सीबीआई की कमान तब मिली है जब यह जांच एजेंसी विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है.
शुक्ला के नेतृत्व में सीबीआई को कई अहम केस सुलझाने हैं. इनमें 2जी घोटाला, कोयला घोटाला, एयर इंडिया स्कैंडल, पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले समेत कई अहम मसले हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में हो रही देरी पर भी नाख़ुशी जताई थी.
आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना में टकराव के कारण सीबीआई पिछले कुछ महीनों से विवादों में थी.
सीबीआई प्रमुख का पद पूर्व निदेशक आलोक वर्मा का ट्रांसफर होने के बाद 10 जनवरी से खाली पड़ा हुआ था.
अब मध्य प्रदेश के डीजीपी रहे ऋषि कुमार शुक्ला को इस पद की ज़िम्मेदारी दी गई है.
ऋषि कुमार शुक्ला 1983 बैच के मध्य प्रदेश काडर के अफसर हैं. ये पहला मौक़ा है जब मध्य प्रदेश काडर के किसी आईपीएस अधिकारी को सीबीआई प्रमुख बनाया गया है.
यह भी संयोग है कि 'रॉ' और सीबीआई दोनों के प्रमुख पहली बार मध्य प्रदेश काडर के हैं. 'रॉ' प्रमुख मध्य प्रदेश कैडर के अनिल धसमाना हैं.
ऋषि कुमार शुक्ला को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का क़रीबी माना जाता है. दोनों इंटेलिजेंस ब्यूरो में साथ काम कर चुके हैं.
शुक्ला मूल रूप से मध्य प्रदेश के ग्वालियर के रहने वाले हैं और वहीं के शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज से बीकॉम में ग्रेजुएट हैं. वे अभी तक मध्य प्रदेश के डीजीपी थे.
मध्य प्रदेश में सरकार बदलने के बाद चार दिन पहले ही कमलनाथ सरकार ने उन्हें पुलिस हाउसिंग कार्पोरेशन का चेयरमैन बनाया था.
इस पद को पुलिस विभाग में डीजीपी के पद के मुक़ाबले छोटा माना जाता है. कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमिटी ने शनिवार को उनके नाम पर मुहर लगाई.
उन्हें दो साल के लिए सीबीआई निदेशक पद पर नियुक्त किया गया है. अभी नागेश्वर राव सीबीआई के अंतरिम निदेशक के तौर पर काम कर रहे हैं.
सीबीआई के नए निदेशक के चयन को लेकर शुक्रवार को दूसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति की बैठक हुई थी.
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोकसभा में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऋषि कुमार शुक्ला के चयन पर सवाल उठाया है. खड़गे भी इस चयन समिति के अध्यक्ष थे.
खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी असहमति जताई है.
उन्होंने शुक्ला की नियुक्ति पर कहा है कि उनके पास भ्रष्टाचार के मामलों को निपटाने का कोई अनुभव नहीं है, इसलिए उन्हें निदेशक नहीं बनाया जाना चाहिए.
खड़गे की आपत्ति पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कांग्रेस नेता चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर चाहते हैं कि वो अपने पसंद के अधिकारी को निदेशक बनाएं.
सिंह ने कहा कि इस चयन समिति के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई शुक्ला की नियुक्ति पर पूरी तरह से सहमत हैं.
शुक्ला को सीबीआई की कमान तब मिली है जब यह जांच एजेंसी विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है.
शुक्ला के नेतृत्व में सीबीआई को कई अहम केस सुलझाने हैं. इनमें 2जी घोटाला, कोयला घोटाला, एयर इंडिया स्कैंडल, पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले समेत कई अहम मसले हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में हो रही देरी पर भी नाख़ुशी जताई थी.
आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना में टकराव के कारण सीबीआई पिछले कुछ महीनों से विवादों में थी.
Friday, February 1, 2019
जानें, एजुकेशन सेक्टर के लिए पीयूष गोयल के बजट में क्या है
आज बजट के दिन सभी की निगाहें कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल पर थीं, जो बजट (अंतरिम) 2019 पेश कर रहे थे. इस साल बजट में शिक्षा के लिए सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा मिशन के लिए 38,572 करोड़ रुपये के बजट की व्यवस्था की है. पीयूष गोयल ने कहा, "2018-19 में, बजट शिक्षा SC और ST के कल्याण के लिए 56,619 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था. जिसे उसी साल 2018-19 में दोबारा बढ़ाकर 62,474 करोड़ रुपये कर दिया गया था. अब इसे बढ़ाकर 76,800 करोड़ कर दिया गया है. इसके अलावा, अंतराष्ट्रीय बाल विकास योजना के लिए 27,584 करोड़ रुपये की योजना की पहल की गई है."
अंतरिम बजट 2019 पेश करते हुए पीयूष गोयल ने कहा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से 1 करोड़ से ज्यादा युवाओं को प्रशिक्षित किया गया. पीयूष गोयल ने कहा देश में अब स्व रोजगार की भावना बढ़ रही है. नौकरी ढूंढने वाले आज नौकरियां देने वाले बन रहे हैं. आज युवाओं के लिए रोजगार सबसे अहम मुद्दा है, पीयूष गोयल ने कहा कि पूरी दुनिया में स्व रोजगार की कल्पना बदल गई है.
जॉब सीकर जॉब क्रिएटर बन गया है. अब एक अच्छी नौकरी के लिए कारखानों में जाने या फिर सरकारी नौकरी के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है. आज के युवा स्व रोजगार भी और अपनी रुचि दिखा रहे हैं. अब नौकरियां सिर्फ कारखानों और सरकारी सेक्टर में ही नहीं रही है.
गोयल ने कहा है कि वेतन आयोग की सिफारिशों को जल्द लागू किया जाएगा. ग्रेच्यूटी की सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख कर दिया गया है. वहीं पीयूष गोयल ने बताया कि अभी तक अभी तक मुद्रा योजना के तहत 5 करोड़ से अधिक लोन दिए गए हैं. EPFO के अनुसार 2 करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी प्रदान की गई है. बता दें कि ग्रेच्युटी का भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत नौकरी पेशा कर्मचारियों को ग्रेच्युटी दी जाती है.
कृषि संकट और किसानों की बदहाली के मुद्दे पर लगातार विपक्ष के हमले झेल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने चुनावी साल में अपने आखिरी और अंतरिम बजट में किसानों के लिए बड़ा ऐलान किया है. सरकार ने इस बजट में देश के लघु एवं सीमांत किसानों को 6000 रुपये प्रतिवर्ष देने का वायदा किया है. सरकार का यह दांव कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की घोषणा के बाद हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में नवगठित कांग्रेस सरकारों द्वारा किसानों की कर्ज माफी के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अक्सर यह आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार चंद उद्योगपतियों का कर्ज तो माफ करती है, लेकिन जब बात किसानों की कर्जमाफी की आती है तो कहती है यह हमारी पॉलिसी नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक समाचार एजेंसी को दिए अपने इंटरव्यू में किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे पर कहा था कि अगर कोई राज्य अपने संसाधनों द्वारा कर्ज माफी करती है तो कर सकती है. लेकिन सरकार का मानना है कि किसानों की समस्या का हल कर्ज माफ करने से नहीं बल्कि उन्हें मजबूत करने से होगा, उनकी क्षमता बढ़ाने से होगा.
देश में किसानों की कुल आबादी का 85 फीसदी लघु एवं सीमांत किसान हैं. ये वो किसान हैं जिनकी जोत अपेक्षाकृत कम है. ऐसे में सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का ऐलान किया है, जिसके लिए 75,000 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है. वहीं, इस वित्तीय वर्ष के लिए 20,000 करोड़ रुपया आवंटित किया गया है. मोदी सरकार की इस घोषणा के तहत देश के 2 हेक्टेयर तक की जोत वाले किसानों को प्रतिवर्ष 6000 रुपये केंद्र सरकार की तरफ से सीधे उनके बैंक खाते में दिया जाएगा. यह राशि फसली चक्र को देखते हुए तीन किश्तों में किसानों के खाते में ट्रांसफर की जाएगी. मोदी सरकार की इस योजना का लाभ देश के 12 करोड़ किसानों को मिलेगा. यह योजना 1 दिसंबर, 2018 से लागू हो जाएगी, जिसकी पहली किश्त जल्द ही किसानों के खाते में होगी.
अंतरिम बजट 2019 पेश करते हुए पीयूष गोयल ने कहा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से 1 करोड़ से ज्यादा युवाओं को प्रशिक्षित किया गया. पीयूष गोयल ने कहा देश में अब स्व रोजगार की भावना बढ़ रही है. नौकरी ढूंढने वाले आज नौकरियां देने वाले बन रहे हैं. आज युवाओं के लिए रोजगार सबसे अहम मुद्दा है, पीयूष गोयल ने कहा कि पूरी दुनिया में स्व रोजगार की कल्पना बदल गई है.
जॉब सीकर जॉब क्रिएटर बन गया है. अब एक अच्छी नौकरी के लिए कारखानों में जाने या फिर सरकारी नौकरी के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है. आज के युवा स्व रोजगार भी और अपनी रुचि दिखा रहे हैं. अब नौकरियां सिर्फ कारखानों और सरकारी सेक्टर में ही नहीं रही है.
गोयल ने कहा है कि वेतन आयोग की सिफारिशों को जल्द लागू किया जाएगा. ग्रेच्यूटी की सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख कर दिया गया है. वहीं पीयूष गोयल ने बताया कि अभी तक अभी तक मुद्रा योजना के तहत 5 करोड़ से अधिक लोन दिए गए हैं. EPFO के अनुसार 2 करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी प्रदान की गई है. बता दें कि ग्रेच्युटी का भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत नौकरी पेशा कर्मचारियों को ग्रेच्युटी दी जाती है.
कृषि संकट और किसानों की बदहाली के मुद्दे पर लगातार विपक्ष के हमले झेल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने चुनावी साल में अपने आखिरी और अंतरिम बजट में किसानों के लिए बड़ा ऐलान किया है. सरकार ने इस बजट में देश के लघु एवं सीमांत किसानों को 6000 रुपये प्रतिवर्ष देने का वायदा किया है. सरकार का यह दांव कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की घोषणा के बाद हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में नवगठित कांग्रेस सरकारों द्वारा किसानों की कर्ज माफी के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अक्सर यह आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार चंद उद्योगपतियों का कर्ज तो माफ करती है, लेकिन जब बात किसानों की कर्जमाफी की आती है तो कहती है यह हमारी पॉलिसी नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक समाचार एजेंसी को दिए अपने इंटरव्यू में किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे पर कहा था कि अगर कोई राज्य अपने संसाधनों द्वारा कर्ज माफी करती है तो कर सकती है. लेकिन सरकार का मानना है कि किसानों की समस्या का हल कर्ज माफ करने से नहीं बल्कि उन्हें मजबूत करने से होगा, उनकी क्षमता बढ़ाने से होगा.
देश में किसानों की कुल आबादी का 85 फीसदी लघु एवं सीमांत किसान हैं. ये वो किसान हैं जिनकी जोत अपेक्षाकृत कम है. ऐसे में सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का ऐलान किया है, जिसके लिए 75,000 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है. वहीं, इस वित्तीय वर्ष के लिए 20,000 करोड़ रुपया आवंटित किया गया है. मोदी सरकार की इस घोषणा के तहत देश के 2 हेक्टेयर तक की जोत वाले किसानों को प्रतिवर्ष 6000 रुपये केंद्र सरकार की तरफ से सीधे उनके बैंक खाते में दिया जाएगा. यह राशि फसली चक्र को देखते हुए तीन किश्तों में किसानों के खाते में ट्रांसफर की जाएगी. मोदी सरकार की इस योजना का लाभ देश के 12 करोड़ किसानों को मिलेगा. यह योजना 1 दिसंबर, 2018 से लागू हो जाएगी, जिसकी पहली किश्त जल्द ही किसानों के खाते में होगी.
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