17 अगस्त, 2013 को इलाहाबाद के आनंद भवन में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने एक पोस्टर लगाया था, जिस पोस्टर पर प्रियंका गांधी की तस्वीर के साथ लिखा था,
मैया रहती है बीमार,
भैया पर बढ़ गया है भार,
प्रियंका फूलपुर से बनो उम्मीदवार,
पार्टी का करो प्रचार, कांग्रेस की सरकार बनाओ तीसरी बार.
इस पोस्टर को लगाने वाले कार्यकर्ता हसीब अहमद को पार्टी ने तुरंत निलंबित कर दिया था. लेकिन 23 जनवरी, 2019 को हसीब अहमद बेहद ख़ुश हैं. उनकी ख़ुशी की वजह है कि अब पार्टी ने प्रियंका गांधी को महासचिव बनाते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है.
इस पर हसीब अहमद कहते हैं, "छह साल से मैं लगातार ये मांग कर रहा था, मुझे इसके चलते दो बार पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया था, लेकिन मैं प्रियंका जी को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग करता रहा था. मुझे बेहद ख़ुशी है कि राहुल जी ने मेरी मांग पर ध्यान दिया और इसका फ़ायदा अब कांग्रेस को ज़रूर होगा."
इलाहाबाद कांग्रेस के शहर सचिव हसीब अहमद प्रियंका गांधी को कांग्रेस में लाने की मांग आख़िर कर ही क्यों रहे थे, इस बारे में पूछे जाने पर हसीब कहते हैं कि 2009 में उन्होंने प्रियंका गांधी को अमेठी में चुनाव प्रचार करते देखा था, तभी से उन्हें लगने लगा था कि अगर यूपी में कांग्रेस को मज़बूत करना है तो प्रियंका को सामने आना ही होगा.
अब कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अकेले चुनाव लड़ने की संभावनाओं के बीच मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है. पार्टी ने प्रियंका गांधी को महासचिव बनाते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है. इसके साथ साथ पार्टी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश (पश्चिम) का प्रभारी बनाया है.
पार्टी के इस फ़ैसले के बाद अमेठी में मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा है, "मैं प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भरोसा करता हूं. हम बैकफुट पर नहीं खेलेंगे. मैं प्रियंका और ज्योतिरादित्य को केवल दो महीने के लिए नहीं भेज सकता. मैं इन्हें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की विचारधारा को बढ़ाने के लिए भेज रहा हूं."
यूपी के कार्यकर्ताओं में उत्साह
प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधानमंडल के नेता अजय कुमार लल्लू खासे उत्साहित हैं. वे बताते हैं, "अब यूपी में कांग्रेस चमत्कार करेगी. प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग कांग्रेस के कार्यकर्ता लगातार करते रहे थे, अब ये मांग पूरी हो गई है, इससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह है."
हालांकि कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि पार्टी के पीछे कार्यकर्ताओं का नितांत अभाव है.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के परंपरागत वोटरों में दलित, मुसलमान और ब्राह्मण माने जाते थे. लेकिन मौजूदा समय में तीनों तबका अलग-अलग पार्टी के साथ जुड़ा है, दलित बहुजन समाज पार्टी के खेमे में दिखाई देते रहे हैं, मुसलमान समाजवादी पार्टी के, जबकि ब्राह्मणों ने भारतीय जनता पार्टी को अपना लिया है.
अजय कुमार लल्लू उम्मीद जताते हैं कि प्रियंका गांधी के आने से स्थिति में बदलाव होगा. वे कहते हैं, "मतदाताओं का जो तबका हमसे दूर हो गया था वो भी अब हमारी ओर उम्मीद से देखेगा. इसकी वजह प्रियंका गांधी का अपना अंदाज़ और व्यक्तित्व है, जिसमें लोग इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं."
हालांकि केवल प्रियंका गांधी के आने से कांग्रेस की स्थिति में बहुत बदलाव होगा, ये बात दावे से नहीं कही जा सकती, क्योंकि पार्टी का परंपरागत मतदाता भी छिटक चुका है और ज़्यादातर हिस्सों में पार्टी का संगठन भी उतना मज़बूत नहीं है. कम से बीते बीते तीन दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की हैसियत चौथे नंबर की रही है.
इस ओर संकेत करते हुए भारतीय जनता पार्टी की ओर से राज्य चुनाव सह-प्रभारी बनाए गए दुष्यंत गौतम कहते हैं कि राहुल गांधी की नाकामी को देखते हुए कांग्रेस ने ये क़दम उठाया है. वे कहते हैं, "मां संरक्षक की भूमिका में हैं, राहुल जी अध्यक्ष हैं और अब बहन महासचिव की भूमिका में. कांग्रेस अंतिम सांसें ले रही हैं ऐसे में कई उपाय कर रही हैं."
Wednesday, January 23, 2019
Tuesday, January 15, 2019
एनडीए और यूपीए, कौन रख पाएगा गठबंधन का बंधन मज़बूत?
मायावती की बहुजन समाज पार्टी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के बीच हुए चुनावी गठबंधन ने न सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के हाथों के तोते उड़ा दिए हैं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र की सत्ता में दुबारा निरापद वापसी की राह में भी रोड़े अटका दिए हैं.
करीब 24 साल पहले लखनऊ में राज्य अतिथि घर में मुलायम सिंह यादव के उग्र समर्थकों ने मायावती पर हमला किया था क्योंकि मायावती ने मुलायम सिंह सरकार को दिया गया समर्थन वापस ले लिया था.
दरअसल, मायावती के राजनीतिक आका कांशीराम और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद 1993 का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा था. तब डर यह था कि 1992 के बाबरी मस्जिद की घटना से उपजी भाजपा लहर की वजह से कहीं राज्य में प्रतिपक्षी दलों का सूपड़ा ही साफ न हो जाए.
इस घटना के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच वैसा ही बैर हो गया, जैसा कि सांप और नेवले के बीच होता है.
मायावती और अखिलेश यादव यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर वो दोनों मिलकर चुनाव लड़ें तो भाजपा को हरा सकते हैं जिसने पिछले लोकसभा चुनावों में प्रदेश की 80 सीटों में से 71 पर क़ब्ज़ा कर लिया था. दो सीटें अपना दल को मिली थीं जो भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए में शामिल है.
मायावती और अखिलेश ने अमेठी और रायबरेली की सीटें राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए छोड़ने की घोषणा की है जबकि दो अन्य सीटें किसी सहयोगी दल के लिए खाली रखी हैं. दोनों पाटियां बराबर-बराबर यानी 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी.
अगर इस गठबंधन में कांग्रेस और चौधरी अजीत सिंह की आरएलडी (राष्ट्रीय लोकदल पार्टी) को भी जगह मिलती तो चारों पार्टियों का वोट प्रतिशत 50 से भी ऊपर पहुंच जाता और तब भाजपा को हराना और भी आसान होता.
यों अब भी भाजपा की सीटें आधी रह जाने की भविष्यवाणी की जा रही है लेकिन कांग्रेस और आरएलडी में अगर चुनावी गठबंधन होता है और मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव की नई पार्टी वोट काटने वाली साबित होती है तो भाजपा को कुछ फ़ायदा भी हो सकता है.
पंजाब, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एक के बाद एक जीत के चलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के हौसले बुलंद रहे हैं. अब भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कर रही है और आने वाले दिनों में कुछ नए आश्चर्य प्रस्तुत करने की भी घोषण कर रही है.
लेकिन, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सीमाएं हर किसी के सामने हैं. वहां बरसों से पार्टी की चुनाव मशीनरी कबाड़ घर में धूल चाट रही है. उसे कामचलाऊ बनाने के लिए राहुल गांधी की आगामी चुनाव रैलियों की भूमिका भी सीमित ही रहेगी.
बिहार में भाजपा और नीतीश कुमार के गठबंधन में कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) कितना पलीता लगा सकती है, यह भी फिलहाल ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता.
अलबत्ता इतना सुनिश्चित लग रहा है कि जो भाजपा पिछले लोकसभा चुनावों में लगभग 180 सीटें मोटे तौर पर उत्तर पश्चिमी राज्यों से लेकर आई थी, कांग्रेस के पुनरोदय ने उस पर कड़ा मुकाबला ला खड़ा किया है.
वैसे यह पुनरोदय राहुल गांधी की कामयाबियों को लेकर उतना नहीं है जितना की नरेंद्र मोदी सरकार की नाकामियों को लेकर है. मोदी की बड़बोली सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी लागू करके देश के मजदूर, किसानों, छोटे दुकानदारों और तमाम गरीब—गुरबों की ज़िंदगी बर्बाद करने का काम किया.
लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगार हुए जबकि बेरोजगारों के लिए प्रतिवर्ष दो करोड़ नई नौकरियां सृजित करने का वादा भी चुनावी जुमला साबित हुआ. तथाकथित गोहत्या के नाम पर मुसलमानों और दलितों की हत्याएं हुईं और समाज को धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर बांट दिया गया.
मोदी के कान विरोध और असहमति की आवाजें बर्दाश्त करने के आदी नहीं हैं. मीडिया पर सरकार की धौंस ने उसकी रीढ़ तोड़ दी है. प्रतिपक्षी पार्टियों को डराने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे लग रहा है कि कोई भी विरोधी नेता निरापद नहीं है
जबकि खुद भाजपा में मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सामने तथाकथित लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी तक हाथ जोड़े खड़े रहते हैं. तमाम नेताओं को लगता रहा है कि या तो भाजपा से बनाकर चलो या फिर ऐसा गठबंधन बनाओ जो भाजपा से लोहा ले सकें.
करीब 24 साल पहले लखनऊ में राज्य अतिथि घर में मुलायम सिंह यादव के उग्र समर्थकों ने मायावती पर हमला किया था क्योंकि मायावती ने मुलायम सिंह सरकार को दिया गया समर्थन वापस ले लिया था.
दरअसल, मायावती के राजनीतिक आका कांशीराम और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद 1993 का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा था. तब डर यह था कि 1992 के बाबरी मस्जिद की घटना से उपजी भाजपा लहर की वजह से कहीं राज्य में प्रतिपक्षी दलों का सूपड़ा ही साफ न हो जाए.
इस घटना के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच वैसा ही बैर हो गया, जैसा कि सांप और नेवले के बीच होता है.
मायावती और अखिलेश यादव यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर वो दोनों मिलकर चुनाव लड़ें तो भाजपा को हरा सकते हैं जिसने पिछले लोकसभा चुनावों में प्रदेश की 80 सीटों में से 71 पर क़ब्ज़ा कर लिया था. दो सीटें अपना दल को मिली थीं जो भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए में शामिल है.
मायावती और अखिलेश ने अमेठी और रायबरेली की सीटें राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए छोड़ने की घोषणा की है जबकि दो अन्य सीटें किसी सहयोगी दल के लिए खाली रखी हैं. दोनों पाटियां बराबर-बराबर यानी 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी.
अगर इस गठबंधन में कांग्रेस और चौधरी अजीत सिंह की आरएलडी (राष्ट्रीय लोकदल पार्टी) को भी जगह मिलती तो चारों पार्टियों का वोट प्रतिशत 50 से भी ऊपर पहुंच जाता और तब भाजपा को हराना और भी आसान होता.
यों अब भी भाजपा की सीटें आधी रह जाने की भविष्यवाणी की जा रही है लेकिन कांग्रेस और आरएलडी में अगर चुनावी गठबंधन होता है और मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव की नई पार्टी वोट काटने वाली साबित होती है तो भाजपा को कुछ फ़ायदा भी हो सकता है.
पंजाब, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एक के बाद एक जीत के चलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के हौसले बुलंद रहे हैं. अब भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कर रही है और आने वाले दिनों में कुछ नए आश्चर्य प्रस्तुत करने की भी घोषण कर रही है.
लेकिन, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सीमाएं हर किसी के सामने हैं. वहां बरसों से पार्टी की चुनाव मशीनरी कबाड़ घर में धूल चाट रही है. उसे कामचलाऊ बनाने के लिए राहुल गांधी की आगामी चुनाव रैलियों की भूमिका भी सीमित ही रहेगी.
बिहार में भाजपा और नीतीश कुमार के गठबंधन में कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) कितना पलीता लगा सकती है, यह भी फिलहाल ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता.
अलबत्ता इतना सुनिश्चित लग रहा है कि जो भाजपा पिछले लोकसभा चुनावों में लगभग 180 सीटें मोटे तौर पर उत्तर पश्चिमी राज्यों से लेकर आई थी, कांग्रेस के पुनरोदय ने उस पर कड़ा मुकाबला ला खड़ा किया है.
वैसे यह पुनरोदय राहुल गांधी की कामयाबियों को लेकर उतना नहीं है जितना की नरेंद्र मोदी सरकार की नाकामियों को लेकर है. मोदी की बड़बोली सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी लागू करके देश के मजदूर, किसानों, छोटे दुकानदारों और तमाम गरीब—गुरबों की ज़िंदगी बर्बाद करने का काम किया.
लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगार हुए जबकि बेरोजगारों के लिए प्रतिवर्ष दो करोड़ नई नौकरियां सृजित करने का वादा भी चुनावी जुमला साबित हुआ. तथाकथित गोहत्या के नाम पर मुसलमानों और दलितों की हत्याएं हुईं और समाज को धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर बांट दिया गया.
मोदी के कान विरोध और असहमति की आवाजें बर्दाश्त करने के आदी नहीं हैं. मीडिया पर सरकार की धौंस ने उसकी रीढ़ तोड़ दी है. प्रतिपक्षी पार्टियों को डराने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे लग रहा है कि कोई भी विरोधी नेता निरापद नहीं है
जबकि खुद भाजपा में मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सामने तथाकथित लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी तक हाथ जोड़े खड़े रहते हैं. तमाम नेताओं को लगता रहा है कि या तो भाजपा से बनाकर चलो या फिर ऐसा गठबंधन बनाओ जो भाजपा से लोहा ले सकें.
Monday, January 14, 2019
बेरहम इंसान: 3 बोरों में मिले 16 कुत्तों के शव, जिसने देखा वो कांप उठा
कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में उस वक्त हड़कंप मच गया जब तीन बोरी भरकर खून से सने कुत्ते और पिल्ले मृत मिले. कहा जा रहा है कि इन कुत्तों को किसी ने पहले जहर दिया फिर उन्हें पीट-पीटकर मार डाला. इस घटना के सामने आने के बाद पशु प्रेमियों में आक्रोश है. एनजीओ के लोगों ने पुलिस स्टेशन का घेराव कर प्रदर्शन किया और कार्रवाई की मांग की है.
इस बारे में एनआरएस मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल के वाइस प्रिंसिपल सौरभ चक्रवर्ती ने बताया कि कुत्तों के साथ इस तरह का व्यवहार करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. यह पहला मौका है जब इस तरह की घटना मेडिकल कॉलेज में हुई हो. हम इस मामले की जांच कर रहे हैं. दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी.
कुछ की चल रही हैं सांसे ...
बोरी में बंद मिले पिल्ले और कुत्तों में कुछ की सांसें चल रही थीं. उन्हें बचाने की कोशिश पशु प्रेमी कर रहे हैं. जब पिल्लों को उठाने के लिए नगर निगम के कर्मचारी वाहन लेकर आए तो पशु प्रेमी नाराज हो गए और शवों को उठाने से मना कर दिया. लोगों का कहना है कि कुत्तों का पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए.
ये भी पढ़ें: नशे में चूर लोगों ने आवारा कुत्ता का पैर-मुंह बांधकर किया गैंगरेप
पुलिस भी जांच में जुटी.
शुरुआती जांच में यह सामने आया कि कुत्ते और पिल्लों को किसी ने जहर दिया फिर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला. फिलहाल पुलिस ने पशु क्रूरता के लिए अज्ञात लोगों पर मामला दर्ज किया है और जांच की जा रही है. पुलिस अस्पताल कैंपस में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाल रही है.
दो महिलाएं फेंकने आई थी बोरे...
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उन्होंने देखा कि दो महिलाएं इन बोरों को फेंककर आई हैं. इनमें एक महिला सलवार सूट पहने हुई थी तो दूसरी जींस. पुलिस को उम्मीद है कि सीसीटीवी फुटेज से सच्चाई सामने आ जाएगी कि कुत्तों की हत्या किसने की.
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर हमला करते हुए योगी ने कहा था कि अगर ये गठबंधन नहीं करते तो अखिलेश कन्नौज की सीट भी नहीं बचा पाते, इटावा और मैनपुरी की सीट तो दूर की बात है.
यहां पढ़ें पूरी खबर... योगी आदित्यनाथ बोले- मायावती ने सपा पर कर दी कृपा, 10 सीटें भी नाक रगड़कर लेते अखिलेश यादव
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में गठबंधन हुआ है. दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. बाकी सीटें अन्य पार्टियों के लिए छोड़ी गई हैं.
वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने रायबरेली से सोनिया गांधी के सामने अजय अग्रवाल को मैदान में उतारा था. मोदी लहर के बावजूद वो सोनिया के सामने कड़ी चुनौती पेश नहीं कर सके थे. लेकिन बीजेपी को करीब पौने दो लाख वोट मिले थे. इसके बाद जब 2017 में विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी को 2, कांग्रेस को 2 और एक सीट पर सपा को जीत मिली थी.
हालांकि कांग्रेस के एमएलसी दिनेश सिंह और जिला पंचायत अध्यक्ष अवधेश सिंह ने पार्टी को छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है. इसके अलावा हरचंद्रपुर से कांग्रेस विधायक राकेश सिंह भले ही बीजेपी ज्वॉइन नहीं किया हो, लेकिन वो कांग्रेस के साथ भी नहीं खड़े दिख रहे हैं.
बीजेपी ने 2019 में रायबरेली और अमेठी की घेराबंदी करने का प्लान बना रखा है. बीजेपी नेता स्मृति ईरानी पिछले पांच साल से अमेठी में सक्रिय हैं. वो लगातार अमेठी का दौरा कर रही हैं और स्थानीय मुद्दों को उठाकर कांग्रेस आलाकमान को घेरती रहती हैं. इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने सोनिया गांधी की संसदीय सीट से एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह को अपने साथ मिला लिया है. इन दिनों दिनेश सिंह कांग्रेस नेतृत्व को घेरने का काम कर रहे हैं.
इस बारे में एनआरएस मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल के वाइस प्रिंसिपल सौरभ चक्रवर्ती ने बताया कि कुत्तों के साथ इस तरह का व्यवहार करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. यह पहला मौका है जब इस तरह की घटना मेडिकल कॉलेज में हुई हो. हम इस मामले की जांच कर रहे हैं. दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी.
कुछ की चल रही हैं सांसे ...
बोरी में बंद मिले पिल्ले और कुत्तों में कुछ की सांसें चल रही थीं. उन्हें बचाने की कोशिश पशु प्रेमी कर रहे हैं. जब पिल्लों को उठाने के लिए नगर निगम के कर्मचारी वाहन लेकर आए तो पशु प्रेमी नाराज हो गए और शवों को उठाने से मना कर दिया. लोगों का कहना है कि कुत्तों का पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए.
ये भी पढ़ें: नशे में चूर लोगों ने आवारा कुत्ता का पैर-मुंह बांधकर किया गैंगरेप
पुलिस भी जांच में जुटी.
शुरुआती जांच में यह सामने आया कि कुत्ते और पिल्लों को किसी ने जहर दिया फिर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला. फिलहाल पुलिस ने पशु क्रूरता के लिए अज्ञात लोगों पर मामला दर्ज किया है और जांच की जा रही है. पुलिस अस्पताल कैंपस में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाल रही है.
दो महिलाएं फेंकने आई थी बोरे...
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उन्होंने देखा कि दो महिलाएं इन बोरों को फेंककर आई हैं. इनमें एक महिला सलवार सूट पहने हुई थी तो दूसरी जींस. पुलिस को उम्मीद है कि सीसीटीवी फुटेज से सच्चाई सामने आ जाएगी कि कुत्तों की हत्या किसने की.
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर हमला करते हुए योगी ने कहा था कि अगर ये गठबंधन नहीं करते तो अखिलेश कन्नौज की सीट भी नहीं बचा पाते, इटावा और मैनपुरी की सीट तो दूर की बात है.
यहां पढ़ें पूरी खबर... योगी आदित्यनाथ बोले- मायावती ने सपा पर कर दी कृपा, 10 सीटें भी नाक रगड़कर लेते अखिलेश यादव
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में गठबंधन हुआ है. दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. बाकी सीटें अन्य पार्टियों के लिए छोड़ी गई हैं.
वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने रायबरेली से सोनिया गांधी के सामने अजय अग्रवाल को मैदान में उतारा था. मोदी लहर के बावजूद वो सोनिया के सामने कड़ी चुनौती पेश नहीं कर सके थे. लेकिन बीजेपी को करीब पौने दो लाख वोट मिले थे. इसके बाद जब 2017 में विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी को 2, कांग्रेस को 2 और एक सीट पर सपा को जीत मिली थी.
हालांकि कांग्रेस के एमएलसी दिनेश सिंह और जिला पंचायत अध्यक्ष अवधेश सिंह ने पार्टी को छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है. इसके अलावा हरचंद्रपुर से कांग्रेस विधायक राकेश सिंह भले ही बीजेपी ज्वॉइन नहीं किया हो, लेकिन वो कांग्रेस के साथ भी नहीं खड़े दिख रहे हैं.
बीजेपी ने 2019 में रायबरेली और अमेठी की घेराबंदी करने का प्लान बना रखा है. बीजेपी नेता स्मृति ईरानी पिछले पांच साल से अमेठी में सक्रिय हैं. वो लगातार अमेठी का दौरा कर रही हैं और स्थानीय मुद्दों को उठाकर कांग्रेस आलाकमान को घेरती रहती हैं. इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने सोनिया गांधी की संसदीय सीट से एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह को अपने साथ मिला लिया है. इन दिनों दिनेश सिंह कांग्रेस नेतृत्व को घेरने का काम कर रहे हैं.
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