Friday, April 19, 2019

क्या पीएम के हेलिकॉप्टर की जांच कर सकते हैं चुनाव अधिकारी?

भारत के निर्वाचन आयोग ने ओडिशा में सामान्य पर्यवेक्षक के रूप में तैनात कर्नाटक काडर के आईएएस अधिकारी मोहम्मद मोहसिन को अगले आदेश तक निलंबित कर दिया है.

अपने आदेश में चुनाव आयोग ने कहा है कि मोहसिन ने 'एसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों' से जुड़े प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया और अपने 'कर्तव्य की अवहेलना' की.

मोहसिन पर ये कार्रवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हेलिकॉप्टर की जांच करने के बाद की गई है. हालांकि चुनाव आयोग ने अपने पत्र में 16 अप्रैल को हुई इस घटना का कोई ज़िक्र नहीं किया है.

बीबीसी ने जब चुनाव आयोग की प्रवक्ता शैफाली शरण से पूछा कि चुनाव आयोग के अधिकारी एसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों के वाहनों की जांच कर सकते हैं या नहीं तो इस पर उन्होंने कोई स्पष्ट जबाव नहीं दिया.

शैफ़ाली शरण ने बीबीसी से कहा, "इस बारे में दिशा निर्देश चुनाव आयोग की वेबसाइट पर हैं. फ़िलहाल इससे अधिक कुछ नहीं कहना है."

उन्होंने कहा, "ओडिशा गए डिप्टी चुनाव आयुक्त कि इस विषय में विस्तृत रिपोर्ट अभी नहीं मिली है. उनकी रिपोर्ट पेश करने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा."

मोहसिन को निलंबित करने के अपने आदेश में चुनाव आयोग ने कहा है कि मोहसिन ने 2019 के दिशानिर्देश संख्या 76 और 2014 के चुनाव निर्देशों के दिशानिर्देश संख्या 464 की अवहेलना की.

ये दिशानिर्देश चुनाव अभियान के दौरान उम्मीदवारों के वाहनों के इस्तेमाल से संबंधित हैं. इन्हीं के तहत किसी भी प्रत्याशी के अपने चुनाव अभियान में सरकारी वाहनों के प्रयोग पर रोक है.

हालांकि प्रधानमंत्री और एसपीजी सुरक्षा प्राप्त अन्य व्यक्तियों को इसमें छूट प्राप्त है और वो चुनाव प्रचार के दौरान भी सरकारी वाहनों का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये छूट सिर्फ़ एसपीजी सुरक्षा प्राप्त नेताओं को मिलती है.

लेकिन क्या कोई चुनाव अधिकारी प्रधानमंत्री या एसपीजी सुरक्षा प्राप्त किसी अन्य व्यक्ति के वाहन की जांच कर सकता है. इस बारे में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है. चुनाव आयोग ने भी इस सवाल का सीधा जबाव नहीं दिया है.

जिन दिशानिर्देशों का उल्लेख चुनाव आयोग ने अपने आदेश में किया है उनमें भी इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.

दस अप्रैल 2010 को जारी दिशानिर्देश संख्या 464/INST/2014/EPS में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी सरकारी वाहन का इस्तेमाल अपने चुनावी अभियान में नहीं कर सकता है.

इनमें कहा गया है, "इन प्रतिबंधों से छूट सिर्फ़ प्रधानमंत्री और उन अन्य राजनीतिक लोगों को मिलेगी जिन्हें चरमपंथी या आतंकवादी गतिविधियों या जान को ख़तरे की वजह से उच्च स्तरीय सुरक्षा की ज़रूरत हो और जिनकी सुरक्षा ज़रूरतें संवैधानिक प्रावदानों या संसद या विधानसभाओं के क़ानूनों से निर्धारित होती हैं."

चुनाव आयोग ने मौका गंवाया
भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी का कहना है कि प्रधानमंत्री के हेलिकॉप्टर की जांच के मामले में चुनाव आयोग ने अपनी छवि सुधारने का मौक़ा गंवा दिया है.

ट्विटर पर क़ुरैशी ने कहा है, "प्रधानमंत्री के हेलिकॉप्टर की जाचं करने पर ओडिशा में तैनात आईएएस अधिकारी को निलंबित करना न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि न सिर्फ़ चुनाव आयोग बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री की छवि सुधारने के एक अच्छे मौक़े को गंवाना भी है. इन दोनों ही संस्थानों पर जन निगरानी बढ़ रही है- प्रधानमंत्री पर बार-बार आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन और चुनाव आयोग पर इसे नज़रअंदाज़ करने के आरोप हैं. प्रधानमंत्री के हेलिकॉप्टर पर रेड से ये दिखाया जाना चाहिए था कि क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं. एक ही झटके में दोनों की आलोचनाओं का जबाव दिया जा सकता था."

विपक्ष ने की आलोचना
कांग्रेस ने चुनाव आयोग के इस क़दम की आलोचना करते हुए कहा है, "वाहन जांच करने का अपना काम कर रहे एक अधिकारी को चुनाव आयोग ने निलंबित कर दिया है. जिस नियम का उल्लेख किया गया है वो प्रधानमंत्री को कोई छूट नहीं देता है."

वहीं कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा, "स्वघोषित चौकीदार के हेलिकॉप्टर की जांच करने वाले कर्नाटक काडर के आईएएस अधिकारी के निलंबन की मैं आलोचना करता हूं. मिस्टर चुनावी चौकीदार, जब छुपाने के लिए कुछ नहीं है तो इतना डर क्यों हैं?"

सोशल मीडिया पर भी सवाल
चुनाव आयोग के क़दम पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता ऋषिकेश यादव ने ट्विटर पर सवाल किया, "चुनाव आयोग को ये भी स्पष्टीकरण देना चाहिए कि किसकी शिकायत पर मोहम्मद मोहसिन पर कार्रवाई की. 16 अप्रैल की शाम क्या हुआ जिसकी वजह से मोहसिन को निलंबित किया गया."

Monday, April 15, 2019

तमिलनाडु में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध क्यों होता है?

पिछले क़रीब एक साल से जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु का दौरा किया, लगभग हर बार "गोबैक मोदी" जैसे हैशटेग सोशल मीडिया में ट्रेंड करने शुरू हो गए.

इस कारण सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या नरेंद्र मोदी को तमिलनाडु में पसंद नहीं किया जाता और अगर नहीं तो क्यों?

कुछ विश्लेषक तो यहां तक दावा करते हैं कि नरेंद्र मोदी जितने अलोकप्रिय तमिलनाडु में हैं, शायद ही किसी और राज्य में होंगे.

स्थानीय पत्रकारों की मानें तो ये हैशटैग्स अप्रेल 2012 में सबसे पहले दिखे. नरेंद्र मोदी राज्य में डिफेंस एक्सपो के उद्घाटन के लिए आए थे और विपक्षी दलों ने कावेरी जल प्रबंधन प्रधिकरण में केंद्र सरकार की कथित देरी के ख़िलाफ़ काले झंडे लहराए थे. इस देरी को कर्नाटक चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा था.

उसके बाद नरेंद्र मोदी ने कई बार तमिलनाडु का दौरा किया है और लगभग हर बार सोशल मीडिया पर ऐसे ही ट्रेंड्स दिखे हैं.

तमिलनाडु में भाजपा बहुत मज़बूत तो नहीं पर पार्टी समर्थकों ने जवाब में 'तमिलनाडु वेलकम्स मोदी' जैसे हैशटैग्स चलाए.

अमरीकी थिंकटैंक एटलांटिक काउंसिल की डिजिटल फोरेंसिक लैब ने पाया कि दोनो पक्षों के हैशटैग्स के ट्रेंड होने में बॉट्स या फ़ेक अकाउंट्स का भी हाथ था.

सोनिया अरुणकुमार के ट्विटर पन्ने पर जाते ही श्रीलंका के चरमपंथी गुट एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरन की तस्वीर नज़र आती है, जिन्हें वो "प्यार" करती हैं.

सोनिया कहती हैं, "हम उन्हें (नरेंद्र मोदी को) ऐसे प्रधानमंत्री की तरह देखते हैं जो विदेश चले जाते हैं, जिन्हें देश की असली समस्याओं से सरोकार नहीं है, जो ग़रीबों के साथ नहीं हैं. और जो हिंदुत्व गुटों के लिए काम करते हों."

सोनिया नोटबंदी, रफ़ाल, बीफ़ पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर ट्वीट करती हैं.

ऐसे हैशटैग्स को ट्रेंड करवाने वाले लोगों में डीएमके कार्यकर्ता, सोशल ऐक्टिविस्ट के अलावा आम लोग भी होते हैं.

केंद्रीय चेन्नई की भीषण गर्मी से बचने के लिए हम एक पार्क में पहुंचे जहां उन्होंने मुझे बताया, "हमारा मक़सद है लोगों का, उत्तर भारतीयों का, अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचना और लोगों तक मुद्दों की सच्चाई को पहुंचाना."

जब तमिलनाडु के किसान दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे तब वो उनसे मिलने क्यों नहीं गए, वो तमिलनाडु पर कथित तौर पर उत्तर भारतीयता और हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान की सोच थोपना चाहते हैं, उन्होंने गजा तूफ़ान से प्रभावित लोगों की कथित तौर पर सुध नहीं ली, उनकी सरकार तमिलनाडु पर कई सौ करोड़ की लागत से बनने वाले न्यूट्रीनो प्रोजेक्ट को लादना चाहती है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक़ इस न्यूट्रीनो प्रोजेक्ट का मक़सद है पार्टिकल फ़िजिक्स में रिसर्च को आगे बढ़ाना, लेकिन कुछ स्थानी लोगों को डर है कि इससे इलाक़े की बायोडाइवर्सिटी या जैव-विविधता के अलावा आम लोगों को नुक़सान पहुंच सकता है.

भारतीय जनता पार्टी प्रवक्ता नारायणन तिरुपति के मुताबिक़ ऐसे आरोप इसलिए सामने आ रहे हैं क्योंकि नोटबंदी से तमिलनाडु के भ्रष्ट लोग तिलमिलाए हुए हैं.

वो पूछते हैं कि जब किसानों का ऋण माफ़ करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी थी तो उन्हें दिल्ली जाकर प्रदर्शन करने की क्या ज़रूरत थी.

तिरुपति का आरोप है कि विरोधी तमिलनाडु सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं और "मैं गर्व से कहता हूं कि मैं एक तमिल हूं और एक भारतीय भी.

नाराज़गी का एक और प्रमुख कारण है मेडिकल कॉलेजों के लिए होने वाली नीट परीक्षा यानि नेशनल एलिजिबिल कम एंट्रेंस टेस्ट का लागू होना.

साल 2017 में तमिलनाडु के अरियलूर के एक गांव में रहने वाली अनीता की आत्महत्या ने नीट को बड़ा मुद्दा बना दिया था.

18 साल की अनीता का सपना था डॉक्टर बनकर सरकारी अस्पताल में ग़रीबों की मदद करना. स्थानीय लोगों ने बताया कि छह से सात हज़ार की आबादी वाले इस गांव में एक डॉक्टर भी नहीं है.

12वी क्लास में बेहतरीन नंबर लाने के बावजूद एक ग़रीब दलित किसान की बेटी अनीता नीट परीक्षा क्लीयर नहीं कर पाईं और आत्महत्या कर ली.

तमिलनाडु में पहले 12वीं कक्षा के नंबरों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हो जाता था लेकिन अब 12वीं के बाद नीट परीक्षा क्लियर करनी पड़ती है.

Monday, April 8, 2019

श्रीनगर: हरे रंग में रंगा बीजेपी का चुनाव अभियान

भारतीय जनता पार्टी ने भारत प्रशासित कश्मीर की श्रीनगर लोकसभा सीट से शेख़ ख़ालिद जहांगीर को टिकट दिया है.

जहांगीर ने अपने स्तर पर स्थानीय मतदाताओं को रिझाने के लिए चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया है.

लेकिन, इस लोकसभा सीट पर बीजेपी के चुनाव प्रचार ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह से लेकर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

बीजेपी ने स्थानीय अख़बारों में दिए विज्ञापनों में भगवा रंग की जगह हरे रंग को शामिल किया है. ये पहला मौका है जब बीजेपी ने अपने पारंपरिक भगवा रंग की जगह चुनावी विज्ञापनों में हरे रंग का इस्तेमाल किया है.

कश्मीर के आम लोगों के बीच ख़ासे लोकप्रिय अख़बार 'ग्रेटर कश्मीर' और 'कश्मीर उज़मा' में छपे इस विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर सबसे ऊपर है.

इसके साथ ही बीजेपी का नाम भी हरे रंग में लिखा हुआ है. हालांकि, बीजेपी का चुनाव चिह्न कमल का फूल सफेद रंग में है.

इसके अलावा विज्ञापन में उर्दू भाषा में लिखा है - 'झूठ छोड़िए, सच बोलिए' और 'बीजेपी को वोट दें'.

बीजेपी नेताओं ने भी कहना शुरू कर दिया है कि कश्मीर में बीजेपी ने जीत दर्ज करना शुरु कर दिया है और तभी पार्टी ने कश्मीर में हरे रंग का इस्तेमाल करना शुरू किया है.

जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर ने बीबीसी से कहा, "इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है. अगर आपने बीजेपी का झंडा देखा हो तो आपने नोटिस किया होगा कि हमारे झंडे में हरा रंग भी है. बीजेपी के झंडे में भगवा और हरा रंग दोनों हैं."

"हरा रंग शांति और विकास का प्रतीक है. आपने हाल ही में देखा होगा कि स्थानीय निकायों के चुनावों में बीजेपी ने अपनी जीत दर्ज की है. इसका मतलब ये है कि कश्मीर के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में बीजेपी को स्वीकार्यता मिल रही है."

वो कहते हैं, "कश्मीर में बीजेपी के झंडे में हरा रंग गायब था. लेकिन अब आप देख रहे होंगे कि जब भी कोई नई परियोजना शुरू होती है तो हरा रंग उसमें जोड़ा जाता है. और बीजेपी रंगों में विश्वास करने वाली पार्टी नहीं है. हम सबका साथ-सबका विकास की भावना में यकीन रखते हैं."

बीबीसी ने ठाकुर के साथ बातचीत में पूछा कि क्या हरे रंग का इस्तेमाल करके स्थानीय लोगों को रिझाने की कोशिश की जा रही है.

इस सवाल के जवाब में ठाकुर ने कहा, "नहीं, इसका मतलब यह नहीं है. आपने पीडीपी का झंडा देखा होगा. वह पूरा हरा है. और नेशनल कॉन्फ्रेंस का झंडा लाल है. केवल बीजेपी का झंडा ऐसा है जिसमें सभी धर्मों के रंगों को जगह दी गई है. मैं एक बार फिर से कहना चाहूंगा कि हरा रंग जीत का प्रतीक है और इसलिए इस रंग को जोड़ा गया है. अब हमारी जीत को कोई नहीं रोक सकता."

जम्मू-कश्मीर बीजेपी इकाई के एक महासचिव आशिक कौल से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के लिए रंगों का महत्व ज़्यादा नहीं है.

वह कहते हैं, "जब उमर अब्दुल्लाह ने इस मुद्दे पर ट्वीट किया था तो ख़ालिद जहांगीर ने ट्विटर के माध्यम से ही इस बात का जवाब दिया था. दूसरी बात ये है कि उन्होंने हरा झंडा नहीं उठाया है बल्कि अपने पोस्टरों में हरे रंग को जगह दी है. ऐसे में रंग हमारे लिए ज़्यादा अहमियत नहीं रखते हैं."

जब बीजेपी के परंपरागत रंग भगवा के बारे में कौल से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "बीजेपी का कोई भी परंपरागत रंग नहीं है. बीजेपी सबका साथ-सबका विकास के नारे के साथ खड़ी है."

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कान्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्लाह ने अपने ट्विटर हैंडल से इस मुद्दे पर लिखा है, "कश्मीर पहुंचने पर बीजेपी का भगवा रंग हरा हो जाता है. मुझे नहीं पता कि ये पार्टी सच में मानती है कि ये मतदाताओं को बेवकूफ़ बना सकती है जबकि ये इस तरह खुद का मज़ाक उड़ा रही है. वो घाटी में चुनाव प्रचार करते हुए अपने असली रंग क्यों नहीं दिखा सकती."

वहीं, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि रंगों को बदलकर बीजेपी कश्मीर में स्थानीय लोगों को रिझाना चाहती है क्योंकि कश्मीर की राजनीति में हरे रंग ने हमेशा ही एक भावनात्मक भूमिका अदा की है और इसका सीधा संबंध धर्म और इस्लाम से है.

वरिष्ठ पत्रकार हारून रहसी कहते हैं, "रंग में बदलाव करने का फ़ैसला उम्मीदवार खुद भी ले सकता है. उन्होंने ये सोचा होगा कि वह अपने पोस्टरों में हरे रंग का इस्तेमाल करके मतदाताओं को लुभा सकते हैं."

वो कहते हैं, "मतदाता काफ़ी मासूम होते हैं और ये चीज़ें काम करती हैं. कश्मीर में हरा रंग राजनीतिक पार्टियों के लिए हमेशा फायदे का सौदा रहा है. सांकेतिक आधार पर हरे रंग को पाकिस्तानी झंडे के रूप में देखा जा रहा है और राजनेताओं ने हमेशा ही इस रंग का इस्तेमाल किया है. ये उसी तरह है जैसे बीजेपी के भगवा रंग को हिंदू रंग के रूप में देखा जाता है. इसी तरह हरे रंग को इस्लामी रंग की तरह देखा जाता है.

Thursday, April 4, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: क्या अखिलेश यादव को आज़मगढ़ में टक्कर दे पाएंगे निरहुआ?

भोजपुरी फ़िल्मों के जुबली स्टार कहे जाने वाले दिनेश लाल यादव उर्फ़ निरहुआ ने स्टारडम हासिल करने के बाद साल 2013 की तपती जून में जिस पहले राजनीतिक कार्यक्रम में शिरकत की थी वो समाजवादी पार्टी ने आयोजित किया था.

मंच पर केंद्र में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव विराजमान थे और दाहिनी तरफ सबसे किनारे की कुर्सी पर निरहुआ को जगह दी गयी थी.

तब खुद उन्हें सपने में भी ख्याल नहीं आया होगा कि छह साल बाद वे उसी लोकसभा सीट के लिए ख़म ठोंकेंगे जिस पर खुद मुलायम ही विराजमान हैं. संयोग का डबल डोज ये कि इस मैदान-ए-जंग में उन्हें उस अखिलेश यादव से पंजा लड़ाना है जिनके कर कमलों से कुछ ही बरस पहले उन्होंने यश-भारती सम्मान ग्रहण किया था.

बमुश्किल हफ़्ता भर पहले 27 मार्च को उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली. दो अप्रैल को सरकार ने उन्हें वाई-श्रेणी की सुरक्षा देने का ऐलान किया और 3 अप्रैल को पार्टी ने उन्हें समाजवादी क़िला कहे जाने वाले आज़मगढ़ लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया.

उसी दिन उन्होंने साफ़ किया कि अखिलेश यादव भाई जैसे हैं लेकिन सिर्फ़ यादव होने के चलते उन्हें समर्थन देना मेरी फितरत नहीं. और ये भी कि वे 'अखिलेश भक्त' नहीं 'देश भक्त' हैं.

पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना और कोलकाता से होकर गाजीपुर के एक ठेठ गाँव में वापसी और फिर मायानगरी मुम्बई से होते हुए दुनिया के ढेरों मुल्कों में स्टेज शो के बाद अब राजनीति?

उनकी ज़िन्दगी में ऐसे नाटकीय बदलाव अक्सर आते रहे हैं.

आप उनसे उनका जन्मदिन पूछें तो वे अपने दो जन्मदिन बताते हैं- पहला 1981 का - जो दिनेश लाल यादव पुत्र कुमार यादव का जन्मदिन है और दूसरा 22 मार्च 2003 का जब उनके एक लोकप्रिय अल्बम 'निरहुआ सटल रहे' ने कामयाबी के ऐसे झंडे गाडे कि 'निरहुआ' उनका दूसरा और कहीं ज़्यादा लोकप्रिय नाम हो गया.

मूलतः उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले की जखनिया तहसील के टडवां गाँव के बाशिंदे दिनेश लाल का बचपन कोलकाता में बीता जहाँ उनके पिता कुमार यादव नौकरी करते थे.

बड़े भाई विजयलाल यादव और चचेरे भाई प्यारेलाल यादव बिरहा गायकी के बड़े नाम हुआ करते थे लिहाजा घर में गायकी को लेकर अच्छा माहौल था. प्यारेलाल की सिफारिश से उन्हें काम मिलना शुरू हुआ. कभी ढोलक तो कभी हारमोनियम बजाने और कभी-कभी कोरस में गाने का भी.

2002 में चंदा कैसेट कंपनी ने उनका एक अल्बम 'रंगीली होली आ गयी' निकाला ,जो खूब बिका. इस सफलता के बाद मशहूर टी सिरीज़ से 2003 में उनका अल्बम 'निरहुआ सटल रहे' आया जिसने बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ डाले.

'दुलहिन रहे बीमार, निरहुआ सटल रहे...' जैसी लाइनों वाला ये गाना दरअसल युवा पीढ़ी पर कटाक्ष करता था जो माँ-बाप की बजाय बीवी पर ज़्यादा ध्यान देते थे. मगर उनकी अलग-अनोखी आवाज़ और जबरदस्त संगीत ने इसे चौराहे-चौराहे तक लोकप्रिय कर दिया और उस साल शादियों में बैंड वालों ने भी इसकी धुन बजाना शुरू कर दिया.

2005 में फैज़ाबाद के रहने वाले निर्माता संजय श्रीवास्तव ने 'हमका ऐसा वैसा ना समझा' फ़िल्म के लिए साइन किया हालांकि उसी बीच निर्माता सुधाकर पाण्डेय ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'चलत मुसाफिर मोह लियो रे' में मौका दिया.

यह फ़िल्म हिट साबित हुई और इसके बाद 'हो गइल बा प्यार ओढनिया वाली से' ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड कमाई की. उनकी फ़िल्म निरहुआ रिक्शावाला पहली भोजपुरी फ़िल्म थी जो ओवरसीज यानी ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, ऑकलैंड और फिजी में भी रिलीज़ हुई.

यह फ़िल्म गोल्डन जुबली साबित हुई और वे भोजपुरी फ़िल्मों के सुपर स्टार बन गए. कुछ अरसे पहले एक लम्बी गुफ़्तुगू में उन्होंने माना था कि किस्मत उन पर खासी मेहरबान रही है और "मुझे ऐसी-ऐसी चीज़ें मिलीं जो मैं कभी सोच भी नहीं सकता था."

वर्ष 2000 में जब उन्होंने गायकी शुरू की तो सपने में भी नहीं सोचा था कि केवल 7 साल के भीतर ऐसा भी आएगा जब वे ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, फिजी और ऑकलैंड में 20 हज़ार की भीड़ के बीच स्टेज शो करेंगे जहाँ विदेशी लड़कियां उनके प्रोग्राम की टिकट अपनी बाँहों पर स्टाम्प की तरह चिपका कर चीखेंगी.

वे भोजपुरी ही नहीं हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में भी पहले ऐसे नायक हैं जिनके नाम से आधे दर्ज़न ज़्यादा फ़िल्में बनीं और चलीं मसलन- निरहुआ रिक्शावाला, निरहुआ चलल ससुराल, निरहुआ नंबर वन, निरहुआ के प्रेम रोग भईल, निरहुआ मेल आदि.

फ़िल्में दरअसल उनकी ज़िन्दगी में बचपन में ही पैठ गयीं थीं. बकौल निरहुआ "24 परगना के बेलघरिया इलाके में जहाँ हम लोग रहते थे वहां से 3 किलोमीटर दूर वीडियो पर फ़िल्में दिखाई जाती थीं. मैं रात को अपने बिस्तर पर दो तकिये सजाकर उस पर चादर डाल कर फ़िल्में देखने निकल जाता था और भोर में 5 बजे आकर वापस बिस्तर पर सो जाता था."

शायद इसी 'फ़िल्मबाज़ी' ने वे उनमें फ़िल्मों की गहरी समझ पैदा की है. अपने प्रोजेक्ट्स डिजाइन करते समय बाज़ार और मांग का खासा ध्यान रखते हैं. चाहे वो स्टंट्स का मामला हो या किसिंग सीन का- भोजपुरी फ़िल्मों में वे अग्रणी प्रयोगकर्ता साबित हुए हैं. फ़िल्म 'नरसंहार' के लिए उन्होंने अपना सर मुंडा लिया क्योंकि फ़िल्म के नायक के पूरे परिवार की हत्या कर दी जाती है. वे चाहते थे कि वे खुद उस पीड़ित की तरह दिखें.

अन्य भोजपुरी कलाकारों से अलग अपनी मेहनत और समयबद्धता के चलते वे दक्षिण भारतीय निर्माताओं में भी लोकप्रिय हैं. 2007 में जी सुब्बाराव ने उन्हें 'कईसे कहीं तोहरा से प्यार हो गईल' में लिया था और उनकी इतनी तारीफ़ हुई कि बाद में बीओ सुब्बारेड्डी ने खिलाड़ी नंबर-1, और मशहूर निर्माता डी रामानायडू ने शिव और दी टाइगर में उन्हें बतौर हीरो साइन किया.